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Saturday, February 18, 2012

48. कहानी संग्रह "आन्हर पीड़ा" में प्रयुक्त ठेठ मगही शब्द


आपीप॰ = "आन्हर पीड़ा" (मगही कहानी संग्रह), कहानीकार - परमेश्वरी; प्रकाशक - अखिल मगही मंडप, लखीसराय-811311; प्रथम संस्करण मार्च-अप्रील 2004 ई॰; VI + 121 पृष्ठ । मूल्य 50 रुपइया ।

देल सन्दर्भ में पहिला संख्या पृष्ठ और बिन्दु के बाद वला संख्या पंक्ति दर्शावऽ हइ ।

कुल ठेठ मगही शब्द-संख्या - 1053

ई कहानी संग्रह में कुल 15 कहानी हइ ।
 
क्रम सं॰
विषय-सूची 
पृष्ठ
0.
समर्पण
III-III
0.
निहारऽ हमरो ओरिया
IV-V
0.
अनुक्रमणिका
VI



1.
आन्हर पीड़ा
1-5
2.
मैया भारती
6-11
3.
औरत
12-21



4.
अपराधी के ?
22-30
5.
लहास के सौदा
31-42
6.
असमिरती
43-59



7.
नौकरी के चक्कर
60-65
8.
नगर भोज
66-72
9.
अनाड़ी
73-80



10.
बँसिया
81-85
11.
नौकरियाहा दुल्हा
86-93
12.
बालाजीत
94-97



13.
धार-साज
98-101
14.
सावा मन लड्डू
102-111
15.
ऑपिस के चक्कर
112-121


ठेठ मगही शब्द ("" से "" तक):
1    अऽ (= और) (जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल ।; उ रसता कि बतैलक, हमर जन्नी के मन बढ़ा देलक । कहलक - जल्दी खा आर ठंढे-ठंढी चल जा ! हमरा कोय बहाना नञ रह गेल हल । खइलूँ अऽ भारी मन से दुखी चलइ घड़ी कहलूँ अपन मागु के - अहे ! कहावत हइ कि साल भर के रसता चली, मुदा महिना वाला नञ । हमरा ई सौटकट में खतरा मालूम दे हौ ।)    (आपीप॰2.13; 6.18)
2    अँकवार (भर ~) (ऊ फेर उहे तरह से मचना डोला के भागऽ लगलइ ! ई दौड़ के पछुए से भर अँकवार पकड़ लेलकइ ! कहलकइ - अब कहाँ यार ! के हँ तों ? सोहगी हँसो लगलइ ! कहलकइ - मचना भूत डोलैलकौ कि हम ?)    (आपीप॰84.8)
3    अँटकल-सटकल (इ तरह से पाँच-पाँच बेरी जोगनी-झकिनी-शाकिनी, भूत-भूतनी, पिचासनी के नाम लेको धूप देको - अंत में सब धूप आग में डाल के कहलका - माय जगहिया, माय गंगा, छूटल-बढ़ल सान्ही-कोन्हा में अँटकल-सटकल देवी-देवता जे हा आशा लगइने । सब के नाम से मुरधान दऽ हियो । हम्मर रोजगार में सहाय होइहा ।)    (आपीप॰31.24)
4    अंडे-पोटे (= बाल-बुतरू, बाल-बुतरू सहित) (जने हियावऽ तने पानिये पानी लखा हे । दूर-दूर तक फइलल पानी समुन्दर के लेखा ! गाँव जइसे समुद्दर में जहाज लंगर डाल देलक हे, इ परलय में के साबूत बचल ? हमरा जानिस्ते तो कोय नञ । गाँव के सब अमीर-गरीब, जने-जाति, अप्पन बाल-बच्चा, अंडे-पोटे के लेले जान बचावइ ले शहर पकड़ लेलक ।)    (आपीप॰1.20)
5    अकचकाना (इ गीत सुनते माँतर सितिया के नीन टूट जाय । बैठलो रहइ तऽ अकचका के अकानऽ लगइ ।)    (आपीप॰73.7)
6    अकबार (= अखबार) (सबेरे अकबार में समाचार छप गेलइ । एकरा पुलिस पकड़ के जेल ले गेलइ । चार दिन माय-बेटी पानी पीको भूखले सूत रहलइ ! मगर भूख तो भूख होवे हे । ऊ केकरे छोड़लक अब तक ? जे नै करा दिये !)    (आपीप॰110.19)
7    अकानना (= ध्यानपूर्वक सुनना) (इ गीत सुनते माँतर सितिया के नीन टूट जाय । बैठलो रहइ तऽ अकचका के अकानऽ लगइ ।)    (आपीप॰73.7)
8    अकेलुआ (होवो दा नगर भोजे सही । मगर एक बात । हम अकेलुआ, से हो करता । हमर समय पिण्डे दै में बीत जइतो । तों कुल्ले नै एकरा में लगभो । अगर कसरइती कइल्हो तो ई काम नै सम्हड़तो ! तब समझो कुल गुड़ माटी । वंस के नाम कि होता आर जिनगी भर बदनामी के कलंक माथा पर । पैसा के कोय सवाल नै हइ । सवाल हइ एकरा सम्हाड़इ के ।)    (आपीप॰66.19)
9    अगड़म-बगड़म (दोसर तरह से सोचहीं । बेटी झोला लेतौ, सबेरे जइतौ तरकारी ले सब्जी मरकिट । पूछतौ टमाटर कइसे ? दस रू॰ किलो । आधा होस उड़ जयतौ । पूछतइ आलू कइसे ? पाँच रू॰ किलो । कोबी ? दस रू॰ कि॰ । बेटी के पूरा होस दुरूस्स ! लेतौ दू सौ गिराम टमाटर, दू सौ गिराम कोबी, पचीस गिराम धनिया के पत्ता ! अगड़म-बगड़म ! झोरा से लेको अइतौ आर गैस चूल्हा पर ओकरे उलटि को सिझैतौ, पलटि को बनैतौ ! ओकरे कुछ अलमारी में रखतौ, कुछ फिरीज में ! खइतौ नञ, ओकरा चाटतौ ! सूँघतौ !)    (आपीप॰90.23)
10    अगोरना (मइया इशारा से सब समझा देलकइ । ऊ आग बबूला हो गेलइ । तोरी मोहना बहिन के ... हम ओकरा माय के बेमारी में दू महीना पटना में अगोर के रहलों होसपिटल के सड़ाँध में । ओकर दू दू गो जवान बहिन साथे सूतऽ हल । मुदा कहियो मन के बेइमान नञ बनैलियै ! अप्पन बहिन समझैत रहलियै ! आर ई एकै दिन में ... !; पेट काट के कौलेज के फीस दा ।  अपने फटल पिन्ही, बाबू साहेब के इजार पिन्हावो, उपर से सेन्ट-साबुन-सरफ, कागज-किताब-कलम ! अऽ पकिट खरचा ! तोरा कहलियौ घर पर रह के पढ़ाइ करो । तऽ कहलें कि नञ चाचा, ओजो टमटरो अगोरवो अऽ एकान्त में पढ़वो करवइ ! देख लेलियो पढ़ाय ! अऽ तों गे छोउँड़ी ? कहाँ दुआर कहाँ घर ! तोर पित्त में कत्ते गरमी हौ जे राते-रात यहाँ तक चल अइलें ?; टमाटर रोपा हो गेल । केरौनी चलो लगल । ओकर मइया कहलकन - मनोज बाबू ! एजो एगो मचान गड़ि दहो । बाँग-बारी चीज बिना अगोरने ? के जाने, कखने कने से कि चल आवे । हम दिन भर माटी में रेटऽ ही । ओकरा कि लगतइ । एक छन में सब कैल-धैल चौपठ ।)    (आपीप॰20.18; 84.22; 105.24)
11    अगोरवाह (गेट के अगोरवाह सिपाही, जे एकरा से पूर्व परिचित हलइ, ऊ कड़क आवाज में कहलकइ - अब यहाँ कहाँ ? जो अब आजाद पंछी नियन विचरें ।)    (आपीप॰43.4)
12    अग्गे (अग्गे माय ! झखुआ मागु सन जबरदस्त जनिऔरी नञ देखलों हें । लाख कहैत रहलियै ! कनियाय ! एकादसी हमरा नञ धारे हे । एकादसी कइलैं हमर झखुआ के बाप अकाश उड़ गेला । से दिन से हम एकादशी के शुभ काम नञ करऽ ही । दोसर कोय तिथि में जइहा, कोय हर्ज नञ !)    (आपीप॰98.10)
13    अघस-मघस (~ करना) (बिहान भेलइ । सूपन फेर उहे तरह से गंगा नहा के सब देवी देवता के पूजा करके वरदान माँग के घर अइला । चिकुलिया सूपन पर बिगड़लइ - अभी ई एजइ अघस-मघस करब करऽ हइ । दुर ने जाय । ई दारूबजवा, ई कुच्छो नञ करतइ ।)    (आपीप॰38.7)
14    अचके (= अचानक) (घुरफेर ओकर ध्यान थरिया-लोटा पर घर के समान पर गेल । मुदा एकरा से पटना जाय के खरचे पुरे हइ । अचके जिछना के आँख चमक गेल । ओकरा याद आयल, वहाँ अस्पताल में खून खरीदल जा हइ । डूबइत के तिनका ... इहे उमक पर चल देलक पटना ।; सब ठीक हो जइतौ ! मुदा दवाय के गोली भीतर जा नञ सकल ... । गियारी में टेंगरा सन अटक गेल । अचके फुलवा के आँख चमक के फैल गेल । इ देख के जिछना के अँखिये नञ देहियो पथला गेल ।)    (आपीप॰4.22; 5.14)
15    अजोर (बाछा उदंत लायल गेल । दुहाव के पाँचो टुक पोसाक मिलल । ऊ पेन्ह के पंडित जी के मंत्रोच्चार के साथ धिपल सड़सी उठैलक । बाछा सड़सी देखते माँतर भूत हो गेल । पें कि करइत हल बेचारा ! ... बहुत आदमी ओकरा बान्ह-छान के गिरा देलकइ - दहिना पुट्ठा पर सड़सी से दाग के तिरसूल के चिन्ह बना देल गेल । से दिन से ऊ अजोर हो गेल । दुहाव कहलकइ - बेटा ! बस एखने भर ! राजा बना रहलियौ ह, राजा ! साँढ़ के जैसेइ छोड़लक .. उ नाँढ़ी कबड्डी बाध देने भागल ।)    (आपीप॰69.12)
16    अटकना (= अँटकना) (सब ठीक हो जइतौ ! मुदा दवाय के गोली भीतर जा नञ सकल ... । गियारी में टेंगरा सन अटक गेल । अचके फुलवा के आँख चमक के फैल गेल । इ देख के जिछना के अँखिये नञ देहियो पथला गेल ।)    (आपीप॰5.14)
17    अथायल-बथायल (मिनिसटर साहब गरम हो गेलखिन । कहलखिन - कुल पागलपन झाड़ि देवो ! होश में बात करो । कलेट्टर कहलकइ - होसे में हियै ! हमर नौकरी तो नै खा सकऽ हो, बदली ले हर-हमेसे बोरिया-बिस्तर बान्हने रहऽ हियइ । एतना कह के फोन रख के दू चारि गारी देलकइ - साला, बहिन ... ई सब अथायल-वथायल कने से मंत्री बन के राज के पैसा लूटइले ... !)    (आपीप॰41.14)
18    अथी (चुनाव हम जीतवइ ! आव मिनिस्टर होवइ । गरंटी हइ । ... भोला कहलकइ - सब समझ गेलिऐ मंत्री जी । एतना बुद्धू नै हियै । मंत्री जी डाँट देलखिन - खूब समझैत रहो । ऐसन बुझक्कड़ रोज हमरा अथी में लटकल रहऽ हइ । भोला कहलकइ - अब अथी में लटकल नञ रहवइ मंत्री जी । जब जेले में हमरा जीवन काटना हइ, तब तोहरा उपर भेजा को !; अनरूध समझैलकन - मनोज धीरज धर ! कछौटा बान्ह ! तोरा राम-लछुमन दू बेटा । संसार कि कहतौ ? बियाह करभो बुढ़ारी में ! नतीजा ! कहावत में हइ - रात के तेल लगावी गेनरा ले, बुढ़ापा के बियाह दोसरा ले । अऽ बेटवा हो जइतो दुसमन ! मामूली नञ, भारी दुसमन ! अथी में पैना करि को खड़ी करि देतो !; धन्नू चा कुरोधि को कहलखिन - फोंफाही ! तोरा अथी में अथी करों ! तऽ हम कि जानऽ हलियै ! फाँसी होतइ से हमरा ने ! हम जानवइ । तों बइठें चुपचाप ।)    (आपीप॰65.14, 15; 104.1; 121.14)
19    अदना (ढेर करी अदना ले, थोड़ करी अपना ले । पपुआ माय, तों तकदीर के सिकन्नर ! गाँग पैसि के वरदान माँगलें हल, जे तोरा हमरा नियर साँय मिललौ ! ऐसन साँय कुल के मिलतइ ?)    (आपीप॰113.9)
20    अदरा (= आर्द्रा नक्षत्र) (ऊ रात अदरा के खीर-पूड़ी बनलइ हल, आँठे-आँठ खा लेलकइ हल ! इ अलाय-बलाय चीज पेट में जाते मातर फेंक देलकइ । फेर कुल्ला कलाला करके सुतलइ !)    (आपीप॰15.22)
21    अदारना (सितिया लोटवा लैत मुस्का के कहलकइ - जो रे भोम्हा ! तोरा कुछ नञ बुझो अइलौ ! अऽ भीतर चल गेलइ । दूधा उझलि को लोटवा मैया पहमा भेजवा देलकइ । सौखवा दू छन खड़ा सोचैत रहलइ - हमरा कि नञ बुझो अइलइ ? फेर इहे सोचैत घर चल अइलै । बिहान दस बजे सितिया के रोकसदी हो गेलइ । सौखवा सवारी के पाछू-पाछू मन में इहे छगुनैत - 'हमरा कि नञ बुझो अइलइ ? सितिया से पूछ के रहबै ।' टीशन तक गेलइ । सितिया के गाड़ी तक अदारलक, मुदा मौका नै मिललइ पूछइ के ।)    (आपीप॰80.1)
22    अधकट्टी (~ चनरमा कट मुसुक्का) (धन्नु चा जैसे चिढ़ावइ ले आझ बैठलखिन हल ! मुसुका को कहलखिन - पपुआ माय ! एकाह दिन जो बजार जा हियै - से मे तो बजार के कत्ते लोग जे नहियों चिन्हऽ हइ सेहो, परनाम पहलवान जी ! राम राम खलीफा जी ! अहो, हम मामूली हियै ? दशा-दिशा नर पूजिता ! पपुआ माय अधकट्टी चनरमा कट मुसुक्का मार के कहलकन - ऊ हूँ, तोरा ने ? तनी एक जमाहर लाल ई बाबू साहेब, से हिनखा कुले परनाम करऽ हन । देखियो तो कुले ला रहलऽ हे, सरकारी गहूँम, सरकारी रूपइया । तोरो से होतइ ?)    (आपीप॰112.15)
23    अधबहियाँ (अधबहिमा = अधबहियाँ + प्रत्यय "-आ") (छउँड़ी सलवार फराक पिन्हऽ लगलइ । मइया कहलकइ - दुर ने जाय ! छिछियैली ! ई लदर-फदर ... एकरा पिन्ह के रोपइ में बनतौ ? पेन्ह ले घंघरिया आव उपर से अधबहिमा कमीचवा । सेकर उपर ओढ़निया ले ले । छउँड़ी सेहे कइलकइ ।)    (आपीप॰105.13)
24    अधरात (कनियाय जे दिन से गेली, एक मिलिट के फुर्सत नञ । चार भाय के एक बहिन दुलारू ! बाबाधाम के माँगल ! साँझे से घर-घर जाको आय-माय के बोलाना । अऽ अधरात तक चिकरि चिकरि को गीत गाना, नाँचना । उमाह के कि कहना । देर तक जगना, बिहान देर से उठना ! मन खराब रहो लगलन ! बुतरू ढिल्ली हो गेल । मुदा उमक में टारने गेली ।)    (आपीप॰100.16-17)
25    अधलाह (बात काटैत सोना दा कहलखिन - डूब मरैत हल ढकनी-पानी में ससुरवा आर कि । वेह वेह ! दुलो चा जे कहलखुन ! सुरँगा रानी के फेर में जहाँ नै चल जाय ! पुश्त दर पुश्त ई अधलाहे रह गेलइ । बप्पो हलइ ऐसने !)    (आपीप॰94.14)
26    अनेर (= अनेरा) (पेट गिराना जुर्म हइ । जा, कहैं दोसरा डाकदरनी यहाँ । हमरा कोय लफड़ा लग जाय तब ?  पुष्पी माय डाकदरनी के गोड़ पकड़ि को कानो लगलखिन, डाकदरनी बीबी ! हमर भाग खराब । बाल-बच्चा जब अनेर हो जा हइ तब कि कैल जा हइ ! गोड़ घसका देलकइ, तब कि करियै ? ... तोरे बेटी ऐसन करि दो तब कि करभो ?)    (आपीप॰19.9)
27    अन्नोर (= अनोर; शोर-गुल) (तब तक दोसर चुनाव आ गेल । चुनाव के नाम सुनते गाँव-गाँव के गली-कुची में चुनाव के चरचा होवो लगल । कहाँ-कहाँ से गड़ल-गड़ल नेता असढ़ुआ बेंग सन अप्पन भाषण से शोर मचा देलक । अन्नोर-अन्नोर हो गेल ।)    (आपीप॰61.18)
28    अन्हरा (= अन्धा) (पंचू कहलकइ - अच्छे हलइ नुनु । तनी बरहवा दिन अलुआ वाला तरकरिया लागइ काँचे रहि गेलइ हल । अऽ तेरहवा दिन दलिया शायत तनी लगि गेलइ हल, तनी जराइन लागइ । बुधना के मन भीतर-भीतर कड़मड़ा गेलइ । बहुत कुछ कहइ ले चाहऽ हलइ, मुदा नञ कह सकलइ । अप्पन पीर भीतरे-भीतर पी गेलइ । ... चमरटोली गेलइ, अन्हरा मनसुखवा बोललइ - के हा ! बुधन बाबू ?; आर एकर नगर भोज भी तो पूरन नञ ने भेलइ । चाही नगर भोज में एक आदमी भी भूखल नञ रहे, अन्हरा मनसुखवा भूखले रह गेलइ ! एक दिन नञ, दोसरो दिन !)    (आपीप॰70.23; 72.7)
29    अन्हार (= अन्धकार) (ऊ उठल, सुतली रात में सान्ही-कोना खोजो लगल । खुर-खुर के आवाज सुन के भइया जागलइ । पूछलकइ - की करऽ हीं गे ? मइया देखहीं ने, कनबलिया वाला डिब्बा जजो धैलियै हल ओजो नञ हइ । मइया कहलकइ - बिहान नञ होतइ । अन्हार में साँप-बिच्छा काट लौ तब ? उना से दूना !; बेटवा कहलकइ - अब कि होतइ माताराम ? ... मैया कहलकइ - बेटा, हमरा कुछ नञ सूझऽ हौ ! अन्हार लखावऽ हौ । - हमरा तो खूब सूझऽ हइ माय । एकर इलाज पाँच मिनट में हमरा हाथ में हइ ।)    (आपीप॰15.16; 108.23)
30    अपसूइया (मुरदा ठीक सामने आके किनारा लग गेलइ ! मौगी अऽ बेटवा जाके देखलकइ । चिकुलिया बोललइ - देखहो ने जी ! अपसूइये हइ, कत्ते सुन्नर हइ ! सुपन जाके देख के हामी भरलका ! हों हों । चिकुलिया कहलकइ - लगऽ हइ माइयो निकसी हलइ ! खस खेलनी ! नान्हें वैस में एकरा पित्त में कत्ते गरमी हलइ ? कोय अपने परिवार चाँप चढ़ा के मार देलकइ हे ! घेंचिया में रस्सी के दाग हइ !)    (आपीप॰33.5)
31    अपसोच (= अफसोस) (मुरदा ठीक सामने आके किनारा लग गेलइ ! मौगी अऽ बेटवा जाके देखलकइ । ... कोय अपने परिवार चाँप चढ़ा के मार देलकइ हे ! घेंचिया में रस्सी के दाग हइ ! सुपन कहलकइ - चलो मशान घाट हिकइ ! यहाँ तरह-तरह के मुरदा आवऽ हइ ! कत्ते ले अपसोच करभो ? तऽ काम चलतो !; भोला कहलकइ - से तो हइ, मुदा जुल्मी के मार के जइतों हल, तब कोय हिरोही नै ! ई बेकसूर के, बिना खदी-बदी के अप्पन गोतिया भाय के मार के जेल गेलों, इहे अपसोच हमरा तिल-तिल खा रहल हे । अपना पेट खातिर ई काम कइलों ! सेहो नै भेल, उलटे बाप-दादा के जे दू बीघा हल सेहो बिक गेल ।)    (आपीप॰33.11; 64.17)
32    अपीसर (= अफसर) (चलती तो हमर कम भेलो, मुदा कुछ अपीसर हइ जे अभी भी हमर बात मानऽ हइ । काम होतई ! देर जे होय, अंधेर नञ होतई ?; पाँच हजार घूस में बात भेलो ! बाबू के कहलियो ! ऊ सूद पर रूपइया लाको देलखिन ! हम दे अइलियै बहाल करइ वाला अपीसर के । ओकरो कइ एक साल हो गेलो !; ऊ पूरा दरखास अऽ साथे साथ औडर सीट पढ़िको समझि गेलखिन । कहलखिन - आप तो महेश बाबू जानते हैं, कैसा अपीसर है यह ! पाँच हजार कर दिया है इधर से ! आप दे दीजिये, हम करवा देंगे ।)    (आपीप॰61.9; 96.11; 119.7)
33    अबरी (कुछो ने मइया । नञ पचलइ । बिगि देलकइ । ले मरीच चिबा के पानी पी ले । पेटे साफ हो जइतौ । मन नै पच-पचइतौ । ई नै चाहइ मुदा मइया डाँट के पिला देलकइ । फेर कै । अबरी निछक्के पानी गिरलइ । पेट साफ ।)    (आपीप॰16.1)
34    अबूध (जा, हम ओतै बहस नञ जानी ! देखऽ हो महेश रात-दिन करि को सरकारी रूपइया निकाललका  संसार अबूध हइ ? तों एगो बुधगर ... ।)    (आपीप॰113.21)
35    अमदी (कुछ मगहिया, 'आदमी' के 'अमदी' कहना ठीक मानऽ हथिन ।)    (आपीप॰V.20)
36    अमोढकार (~ कानना) (हम गोड़ पड़ के कहलियै दादा, जान मत मारें, हम कहैं नञ कहवौ ! मन में सोचलूँ, एक दिन में होतइ कि ? से देखो यह, धर लेलकौ मइया । कहके ... अमोढकार कानो लगलइ ।)    (आपीप॰17.13)
37    अर-अगड़मस्त (उ अर-अगड़मस्त ! भरपूर जेबी वाला खातिर हइ ।)    (आपीप॰22.16)
38    अर-उमर (तोर अर-उमर बहुत छोटा हो । हमरा लखे तो तीनो बच्चा हहो, कोय पचीस के, कोय तीस के, कोय जादा से जादा चालीस के ! बस भेलइ, हमर बेटा-पोता के उमर के ।)    (आपीप॰10.18)
39    अलगंठे (मंत्री जी मुसकुरा को पूछलखिन - कि काम हलइ ? सूपन सारी नोसो से कह सुनइलखिन । मंत्री जी सुन के हँसलखिन । हँसते-हँसते कहलखिन - अलगंठे एसकरे निगलि जाय ले चाहऽ हहो ! दू लाख ! एसकरे खइभो तब पचतो ? अरे ! बाँटि-चुटि के खाय राजा घर जाय, तभी ने ? नञ तब जेल के तैयारी करहो !)    (आपीप॰40.11)
40    अलटा (= अल्ट्रा) (राजनन्दिनी शहर के नामी डाक्टरनी ! सबेरे पुष्पी के लेके पुष्पी के माय वहाँ पहुँचली । डा॰ नवज देख के कह देलकन, बच्चा आवइ वाल हइ । अल्ट्रा-साउण्ड करवा लहो । पुष्पी माय कहलखिन अलटा-पलटा कि करभो, गरीब आदमी । ओकरा में पैसा ने लगतइ जी ? बियाहल रहते हल तब सोचतिये हल कि बेटी के मारी अऽ बेटा के बचावी । कुमारि-वारि हइ, बेटा रहइ कि बेटी, खलास कर दहो, डाकदरनी साहब !)    (आपीप॰19.1)
41    अलागम (कम से कम जिनगी में भूत कैसन होवऽ हइ से तो देख लेवइ । फेर ऊ उहे पहर बाँसुरी रंग में बजावऽ लगलइ । आव नीचे उपर भी देखइ ! पहिला नियर अलागम नञ हलइ ।)    (आपीप॰83.18)
42    अलाय-बलाय (ऊ रात अदरा के खीर-पूड़ी बनलइ हल, आँठे-आँठ खा लेलकइ हल ! इ अलाय-बलाय चीज पेट में जाते मातर फेंक देलकइ । फेर कुल्ला कलाला करके सुतलइ !)    (आपीप॰15.23)
43    अलोधन (= अलभ्य धन; दुष्प्राप्य वस्तु; अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति) (नवीन जेल से बाहर आ गेल । असमिरती बहुत खुस हल । ओकरा लग रहल हल कि आझ हम सब कुछ पा गेलूँ । मानो जीवन के अलोधन । इ नवीन के चरण झुक के छुए ले चाहलक । नवीन पाँव पीछे हटा लेलक । एकरा खड़े ठकमुरकी लग गेल ।)    (आपीप॰48.24)
44    अल्लर-वल्लर (अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ । गँहूम फटकतइ । चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ !)    (आपीप॰89.13)
45    असठी (= ओलती के नीचे बना चबूतरा, ओटा) (नजर उठइलूँ पोखर के पीड़िया पर पच्छिम देखऽ ही माटी के दुमहला मकान, खपड़ा पोस, बहुत सुन्दर । ... घर के नगीच अइलूँ कि देख के मन सिहा गेल । पक्का अऽ टाइल्स ओकरा भिजुन सब झूठ । चौतरफ माटी के चहरदीवारी, ओकरे पर खपड़ा फेरल ताके धखोरे नञ ! देवाल के बाहर-बाहर ठेहुना भर ऊँच असठी, देवाल लाल गेरू रंग के माटी से बढ़िया को नीपल, मुख दुआर पर माटी के बनल सिंघ, लागे जैसे सचकोलवा सिंघ ।)    (आपीप॰7.14)
46    असढ़ुआ (~ बेंग) (तब तक दोसर चुनाव आ गेल । चुनाव के नाम सुनते गाँव-गाँव के गली-कुची में चुनाव के चरचा होवो लगल । कहाँ-कहाँ से गड़ल-गड़ल नेता असढ़ुआ बेंग सन अप्पन भाषण से शोर मचा देलक । अन्नोर-अन्नोर हो गेल ।)    (आपीप॰61.17)
47    असूल (= वसूल) (छोड़ें ऊ सब बात । देखहीं लाख टका के बात एक बतावऽ हियौ । कहल्हीं ने सरकारी पैसा ! ऊ सब भला आदमी के नञ लै के हिकइ । हमरा से नञ तऽ हमरा मरला के बाद, बालो-बच्चा से असूल करि सकऽ हइ । जानि-बुझि को लै ले नञ चाहऽ हियै । दोसरे ऊ हिकइ धुरफंदी काम !)    (आपीप॰113.5)
48    आँख (~ में पाँख) (जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल । कौर चिबावइत फुलवा जिछना दने हियावे हे, तऽ देखे हे कि गुजुर-गुजुर दूगो आँख कटोरा दने ताक रहल हे । जब कौर उठावे तऽ ओकरा लगे कि हर कौर में फुलवा के आँख हे । नञ रहल गेलइ । आँख में पाँख ओकरा वंस में इहे, एकरा ले ऊ कि नञ कर सके हे ।; हम हरजोतवा के बियाहवइ ! चाहे भीखमंगा रहे ! निधुरीवा ! निजलिया ! मुदा हम बियाहवइ कुर्सी पर बैठइ वाला के । हमरा आँखि में पाँखि एक्के गो माया बेटी ! सेकरा करवइ हरजोतवा से ?)    (आपीप॰2.16; 89.16)
49    आँचर (= आँचल) (बुढ़िया आँचर पसार के टेंटुआ लोर ढारते भगवान से कहलकइ - जानो भोला बाबा ! बुतरू जाहो कानल, हँसल घर आवे ! लड्डू चढ़इवो हलुमान बाबा ! धुरियाइले गोड़ चल चढ़ा देवो बाबा बैदनाथ ।)    (आपीप॰101.14)
50    आँठे-आँठ (ऊ रात अदरा के खीर-पूड़ी बनलइ हल, आँठे-आँठ खा लेलकइ हल ! इ अलाय-बलाय चीज पेट में जाते मातर फेंक देलकइ । फेर कुल्ला कलाला करके सुतलइ !)    (आपीप॰15.22)
51    आँय (किरानी बाबू मुँह में कौर लेलखिन कि ई कहना शुरूह कैलखिन - आँय जी ? कान में करूआ तेल दे को सूत गेल्हो ! निट्ठाह ! जुग जमाना खराब बीतऽ हइ । जुआन बेटी बाहर ! शहर पटना में राखऽ हो ! कैसनो कुछ हो जाय, के जाने ? प्रभू के शान, गोड़ घसक जाय ! तऽ कहाँ के रहभो ?; )    (आपीप॰87.1; 117.22)
52    आगू (= आगे) (सब के नाम से मुरधान दऽ हियो । हम्मर रोजगार में सहाय होइहा । हम मुरूख आदमी । पूजा-पाठ के विधि-विधान नञ जानऽ हियो । जतना जानलियो कैलियो । आगू तोहर खुशी ।)    (आपीप॰32.1)
53    आगू-आगू (सूपन कहलकइ - ऊ लहसवा कने से रहतइ पगली । बनिया ले जइतइ लहास ? चलें हम्मर घाट सूना हे । छोड़ें इ सब बम-बखेड़ा । - जो ने तोर घाट, तों अगोरें । हम देख लेवइ तब जइवइ । चिकुलिया चल देलकइ आगू-आगू । लाचार पाछू-पाछू सूपन भी गेला ।)    (आपीप॰36.11)
54    आझ (= आज) (बुढ़िया फेर हुकुम देलकइ - जो जल्दी ! आझे ! अभी !; बप्पा कहलकइ - जो, समझ गेलियै । बेटवा चल गेलइ । एकरा से कहलकइ - खबरदार ! आझ भर छोड़ि दऽ हियौ ! एक कसूर भगमानो माफ करऽ हथिन । हम तो आदमिये ही । भविस में ऐसन बात नै होवइ के चाही, नञ तऽ हमरा से बुरा तोरा लिये कोय नञ होतौ ।)    (आपीप॰99.7; 110.5)
55    आद (= याद) (ई विरह गीत ऊ काहे गावऽ हलइ ? सचमुच ओकरा जीवन में कोय विरह वेदना घर कइले हलइ ? ऐसन कुछ बात नञ । उ तो जब मौज में आवइ तभी ई गीत गावऽ हल । ओकरा दोसर गीत नञ आवऽ हलइ, या आद नञ हलइ ! सीखइ के कोरसिस भी नञ कैलक हल ।; सौखवा मुसका के कहलकइ - दुर्रर्र! जे जेकरा कहइ के मन होवइ से से कहे ! अनाड़ी तऽ अनाड़िये सही । हमरा आद रहतौ थोड़े ?)    (आपीप॰73.13, 24)
56    आददास्त (= याददास्त) (धन्नू चा सबेरे घर से दही-चूड़ा खा को, जतरा बनैने सबसे पहिले आपिस में दम दाखिल । जइते इनरदेव बाबू के सलाम ठोकलखिन ! पूछलखिन - हमर दरखास अइलइ इनरदेव बाबू ? ऊ कहलकन - किसके नाम से ? - धन्नू पहलमान के नाम से । ऊ उलटि-पुलटि को फाइल देखो लगलइ । चाचा पढ़ल तो नै मुदा आददास्त के बड़ी तेज । हिनखर दरखास के पीठिया पर रसुनाय के दाग हो गेलइ हल । पट दोकोऽ चिन्ह गेलखिन - यह तो हिकइ !)    (आपीप॰115.24)
57    आन्हर (= अन्धा) (सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् भेल कि नञ ? तों देखो, अब आन्हर पीड़ा हम्मर नञ है, तोहर है । तों अब जइसे ला ।; कोट के बीचोबीच में एक सफेद मूर्ति खड़ी हइ । ओकर आँख पर करकी पट्टी बान्हल हइ । आर ओकरे हाथ में इन्साफ के तराजू हइ । मतलब कानून आन्हर हइ, बहिर हइ, यहाँ के चपरासी से लेके जज तक ।)    (आपीप॰IV.8; 24.20)
58    आन्हर-बहिर (= अन्धा-बहरा) (कोट के बीचोबीच में एक सफेद मूर्ति खड़ी हइ । ओकर आँख पर करकी पट्टी बान्हल हइ । आर ओकरे हाथ में इन्साफ के तराजू हइ । मतलब कानून आन्हर हइ, बहिर हइ, यहाँ के चपरासी से लेके जज तक । मुंशी से लेके वकील तक, सब आन्हर-बहिर के जमात हइ । एकरा मात्र पैसा सूझऽ हइ, ओकर बाद कुछ नञ ।)    (आपीप॰24.21)
59    आपिस (= ऑफिस) (महेश बहुत देरी बाद अप्पन काम निवटा के अइलन । पूछलकन - देल्हो दरखास ? - हों हों । - केकरा ?  तरजनी अँगुरी से बता के कहलखिन - वह जे अपिसवा के दुअरिया पर खड़ा हइ । - आय महाराय ! ऊ तो चपरासी हिकइ ।; धन्नू चा सबेरे घर से दही-चूड़ा खा को, जतरा बनैने सबसे पहिले आपिस में दम दाखिल । जइते इनरदेव बाबू के सलाम ठोकलखिन ! पूछलखिन - हमर दरखास अइलइ इनरदेव बाबू ?; धन्नू चा के मन तो बिगड़लै, मुदा गम भीतर पचा गेलखिन । दरखास जेबी में चपोत के धइने घर आ गेला । बिहान महेश के सारी नो सो से कहि सुनैलखिन । महेश कहलकन - चलिहा, काल्हु छुट्टी हइ, चलवो । सबेरे तैयार होको दुइओ गेला आपिस ।)    (आपीप॰114.18; 115.19; 116.24)
60    आय (= आज) (रे पगला ! एकरा ले एते चिन्ता ? ई चीज तो मकइ के दोबर सड़क पर फेंकल मिलऽ हइ । ... मनोज टेंटुआ लोर ढारैत कहलका - भैवा ! कजो मिलऽ हइ ? कइसे मिलऽ हइ ? हमरा तो आय तक एको गो नञ मिलल । केकरा कहों ? कि कहों ?)    (आपीप॰104.13)
61    आय (महेश बहुत देरी बाद अप्पन काम निवटा के अइलन । पूछलकन - देल्हो दरखास ? - हों हों । - केकरा ?  तरजनी अँगुरी से बता के कहलखिन - वह जे अपिसवा के दुअरिया पर खड़ा हइ । - आय महाराय ! ऊ तो चपरासी हिकइ ।)    (आपीप॰114.20)
62    आय-माय (कनियाय जे दिन से गेली, एक मिलिट के फुर्सत नञ । चार भाय के एक बहिन दुलारू ! बाबाधाम के माँगल ! साँझे से घर-घर जाको आय-माय के बोलाना । अऽ अधरात तक चिकरि चिकरि को गीत गाना, नाँचना । उमाह के कि कहना । देर तक जगना, बिहान देर से उठना ! मन खराब रहो लगलन ! बुतरू ढिल्ली हो गेल । मुदा उमक में टारने गेली ।)    (आपीप॰100.15)
63    आर (= और) (ऊ बुढ़िया हिकइ दलाल, फुसलौनी माय, गहकी बझा को लावऽ हइ । उहे आमदनी से ई चलि रहलइ हे । आर कि कुछ रोजी-रोजगार हइ ? कि खेती ?; तब तक दोसर अइलइ । उहो काम करा के झट चल गेल ! इ बुझलका ओह ! जेकर पैसवा देल हइ सेकर झट सियाँ निकालि को दे दऽ हइ । आर कुछ बात नञ । पूछलखिन - इनरदेव बाबू, हमर उपरे में हलइ, सेकरा सात तह नीचे करि देल्हो । आर ओकर वाला सात तह नीचे से निकाल के देलहो । पैसवे के चलते से ने ? बोलो ने, कि तोहर फीस हो ? हमहूँ दे देवो ! आर कि ?)    (आपीप॰10.7; 116.8, 9, 11)
64    आरी-अहरी (उठ बन्दा, चल परसंडा, से चल देलूँ । जेठ के महीना । चलैत-चलैत दस एगारह बज गेल । टप-टप देह से घाम चूअऽ लगल, पियास से ठोर तिल-तिल सूखे लगल । एक पैड़िया रसता खेते-खेत कहैं आरी-अहरी काँटा-कुस्सा पार कइने-कइने पहुँचलों जहाँ देख के मन प्रसन्न हो गेल । जल भरल तालाब, तालाब पर घनगर पिपर के गाछ ।)    (आपीप॰7.2)
65    आरे-दुरे (हम बियाहवइ कुर्सी पर बैठइ वाला के । हमरा आँखि में पाँखि एक्के गो माया बेटी ! सेकरा करवइ हरजोतवा से ? किरानी बाबू कहलखिन - एकरा कुछ के कमी नञ हइ । धन आरे-दुरे । औकात मुताबिक इहे ठीक हइ । कुरसी पर बैठइ वाला सिरिफ फरस बुकनी छोड़इ वाला होतौ । लसर मेरहा ! देखइ में चिक्कन जेकर जूरा करे महँ महँ, पेट करे कुह कुह ! बेटिया जिनगी भर कानते रहतौ । कुरसी पर बैठइ वाला तो हमहूँ ने हिकियै ! तऽ कि हइ । सोचहीं ने ।)    (आपीप॰89.18)
66    आल-औलाद (अच्छा बेटा ! हम एकर जवाब देवौ कि तोर आल-औलाद याद रखतौ ।)    (आपीप॰20.21)
67    आव (= आउ; और) (एतना से हम खुद सन्तुष्ट नञ ही, तों कने से सन्तुष्ट भेल होवा ? ई विषय गंभीर आव बड़गो है । हमरा पास ओत्ते लिखइ ले ई किताब में जगह नञ है ।)    (आपीप॰V.26)
68    आवडर-पावडर (ओकर बाल छुअइत कहलखिन - देखहीं तो, एतना सुन्नर बाल, से लटियाल ! साबुन से काहे नञ साफ कर दै हहीं ? - हों करबइ । सबुने खतम हो गेलइ । आसकत ! कीनबइ ! ई एक हरयरकी नोट चमचम नमरी ओकरा हाँथ में दैत कहलखिन - ले । एकरे से जे तोरा मन होतौ खरीद लिहें । साबुन-सर्फ, आवडर-पावडर । सोचिहें नै । फेर माँगवौ नञ ।)    (आपीप॰106.24)
69    आसकत (= आलस्य) (ओकर बाल छुअइत कहलखिन - देखहीं तो, एतना सुन्नर बाल, से लटियाल ! साबुन से काहे नञ साफ कर दै हहीं ? - हों करबइ । सबुने खतम हो गेलइ । आसकत ! कीनबइ ! ई एक हरयरकी नोट चमचम नमरी ओकरा हाँथ में दैत कहलखिन - ले । एकरे से जे तोरा मन होतौ खरीद लिहें । साबुन-सर्फ, आवडर-पावडर । सोचिहें नै । फेर माँगवौ नञ ।)    (आपीप॰106.22)
70    आसरम (= आसरे; आश्रम; जाति, वर्ण; उपजाति) (एकन्त में बेटिया से पूछलकइ - ई के हिकइ गे ? हमरे साथ पढ़ऽ हइ । हमहीं कहलिअइ तनी घर तक पहुँचा दे सुबीर ! बड़ी भला आदमी हइ । समझी ने अप्पन काम छोड़ के आ गेलइ ! पहुँचाबइ ले । रात ठहरलइ । सबेरे सुबीर उठलइ । मैया पूछलकइ - कौन आसरम हहो बौआ ? ऊ हँस के कहलकइ - माये से पूछथिन ने । ऊ हमरा बारे खूब जानऽ हथिन, हमर घर भी देख अइलखिन हें ।)    (आपीप॰86.13)
71    इंजोर (चलो दादा, एजइ सुत रहब ! बहुत आदमी तो सुतल हइ, उपर से दिन नियर इंजोर, सुरक्षा ले सेवा सन्ती ! परवचन भी सुनब, खाय ले कलौआ हइये हइ । कि परवाह ।)    (आपीप॰16.22)
72    इजार (~ पिनहाना) (पेट काट के कौलेज के फीस दा ।  अपने फटल पिन्ही, बाबू साहेब के इजार पिन्हावो, उपर से सेन्ट-साबुन-सरफ, कागज-किताब-कलम ! अऽ पकिट खरचा ! तोरा कहलियौ घर पर रह के पढ़ाइ करो । तऽ कहलें कि नञ चाचा, ओजो टमटरो अगोरवो अऽ एकान्त में पढ़वो करवइ ! देख लेलियो पढ़ाय ! अऽ तों गे छोउँड़ी ? कहाँ दुआर कहाँ घर ! तोर पित्त में कत्ते गरमी हौ जे राते-रात यहाँ तक चल अइलें ?)    (आपीप॰84.20)
73    इनजीयर (दोसरा नम्बर में देखल जाय ! डाकदर-इनजीयर-ओभरसीयर नौकरी लगल वाला ! बिना नौकरी वाला तो कत्ते मारल बुलऽ हइ ! बिना नौकरी वाला बतौर मजूर समझो ।)    (आपीप॰87.15)
74    इनिस्टर-मिनिस्टर (इसकुल अच्छा चलऽ हलइ । बहुत लड़की रहऽ हलइ, सब अप्पन-अप्पन घर चल गेलइ । नेतवे एकरा बरबाद करि देलकइ । ई तीनो गो रहि गेलइ । ई तीनो खतम हइ ! ओकरा में सबसे तनी नीक सभ्यते हइ । संसकिरतिया तो भारी भ्रस्ट हइ खधोड़ी । ओकरा रात-दिन उहे चाही । राजनीतिया किरीमनल हइ ।  एक से एक नेता, इनिस्टर-मिनिस्टर एकरा भिजुन आवऽ हइ ।)    (आपीप॰11.2)
75    इसटिमिट (= इस्टिमेट, estimate) (विचार भेल - सबसे पहिले तो ई पता हो जाय कि हमरा गाँव में कत्ते आदमी हइ, बूढ़ा-बुतरू, औरत-मर्द, जवान ! ओकर बाद में समान के लिस्ट ! कतना आदमी के खिलाना हइ पहिले ई तो ऐडिया मिल जाय । हर टोला के, महल्ला के, जाति के लोग अप्पन जनसंख्या बता देलखिन । फेर तो इसटिमिट बन गेल - दू थान ! लड्डू-जिलेबी, पूड़ी-तरकारी, आलू-परवल के रतोवा ! दही-चीनी रेड़म-रेड़ ! बस एकरा से जादा नञ !)    (आपीप॰67.16)
76    उखविखाना (भोरे-भोरे बाँसुरी के बजा दे हइ ? हमर मन उख-विखा दे हइ । के बजावऽ हइ ? काहे बजावऽ हइ ? जरलाहा ! दूत-भूत तो नञ हइ ?)    (आपीप॰81.1)
77    उघारे (= उघार; खुला) (बराहमन के पाँचो टुक पोसाक हे, बकि माथा जे समूचे शरीर में सरेठ, सेकरा में टोपी नै । बरहमन के माथा उघारे, तब सब बेकार ।)    (आपीप॰70.1)
78    उजूर (= उज्र, एतराज, आपत्ति) (सूपन कहलका - बड़ी खुसी के बात हजूर ! जेकरा से जाँच कराभो करा लहो । हमरा कोय उजूर नञ ।)    (आपीप॰39.13)
79    उज्जर (= उज्ज्वल, उजला) (हमर पाँव के आहट पाको एक बुढ़िया घर से निकलल, पाँचो हाथ नम्बा तगड़ा गोर बुराक, माथा के बाल उज्जर बर्फ, फह-फह बगुला के पाँखि सन साड़ी पिन्हने, जइसे छहाछत भारत माता, शीश मुकुट हिमवान देश का, या खुद सरसती माता ।; जे उज्जर बगुला के पाँखि नियर कपड़ा पिन्हऽ हइ, खस साबुन लगावऽ हइ, चप्पल से नीचे नञ उतरऽ हइ, मुँह में पौडर लगावऽ हइ, कान में अतर के फाहा खोंसऽ हइ, से कइसे ओकरा जौरे सुततइ ? हरजोतवा जौरे !)    (आपीप॰8.3; 90.1)
80    उज्जर-पीयर (= उजला-पीला) (जुआन बेटा चलल जा हइ । जान के जहर खाय, देव के दिये दोख । डाकदर के मना कइलो पर मछली खिला देलकइ । गठरिया खुले न बहुरिया दुबराय । ई मंगनियाहा दवाय से कहैं आदमी निम्मन भेल हे । कोय बेमारी होय, इ सरकारी डाकदर यहाँ जा कि चट सनी एक सीसी रंग और उज्जर-पीयर गोली !)    (आपीप॰3.25)
81    उट्ठा (कुछ दिन बाद ऊ टेबि को अइलइ, खूब सोचि विचारि को ! अपन जाति के मोहल्ला में जाको सड़क किनारे । चौराहा पर फर्द में टाट के झोपड़ी देको चाह के दोकान देलकइ ! छउँड़ा बाजार में उट्ठा सो-पचास कमा लै । मैया-धीया यहाँ चाह के दोकान पर रहइ ।)    (आपीप॰108.4)
82    उतरा-चौली (अब जिछना के मुँह में वकारे नञ ! धान दिये लावा होय लावा ... । ऊ फिहा-फिहा हो गेल । अँगना में देखइ वालन के मेला जुट गेल । जिछना के कपार में आग लग गेलइ । उतरा चौली के गलबात चलो लगलइ । जुआन बेटा चलल जा हइ । जान के जहर खाय, देव के दिये दोख ।)    (आपीप॰3.21)
83    उदंत (जब पूर्ण पिण्ड दान हो गेल तब पंडित जी हुकुम देलका - अब सँढ़दग्गी होवो दा ।  बाछा उदंत लायल गेल । दुहाव के पाँचो टुक पोसाक मिलल । ऊ पेन्ह के पंडित जी के मंत्रोच्चार के साथ धिपल सड़सी उठैलक । बाछा सड़सी देखते माँतर भूत हो गेल ।)    (आपीप॰69.9)
84    उदेस (= उद्देश्य) (मनीसी लोग के कहना हन कि सच जब सुन्नर हो जाय तब उ शिव हो जाहै । हमर उदेस भी इहे है कि हमर रचना सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् होय !)    (आपीप॰IV.7)
85    उनखर (= उनकर; हुनखर) (शुरूह में बरतुहार अइलइ - मुदा साफ जबाब दे देलखिन । हमरा सोना सन दू बेटा ! आँखि में पाँखि । बियाह करि को एकरा फाँसी चढ़ा दिये ? खिला-पिला के बिदा करि देथिन । संसार में उनखर परसंसा होवो लगल । हुनकर चलित्तर के सराहना ! बस !! बेटा कहीं मनोज ! नान्हें वैस में मागु मरि गेलइ ! चब्बोस ! कछौटा के पक्का कही कलयुग के भीष्म पितामह ।)    (आपीप॰102.22)
86    उना (~ से दूना !) (ऊ उठल, सुतली रात में सान्ही-कोना खोजो लगल । खुर-खुर के आवाज सुन के भइया जागलइ । पूछलकइ - की करऽ हीं गे ? मइया देखहीं ने, कनबलिया वाला डिब्बा जजो धैलियै हल ओजो नञ हइ । मइया कहलकइ - बिहान नञ होतइ । अन्हार में साँप-बिच्छा काट लौ तब ? उना से दूना !)    (आपीप॰15.16)
87    उन्नैस (= उन्नीस) (उन्नैस हाथ लम्बा, दू हाथ चौड़ा, मारकिन के कपड़ा, गोबर से नीप जगह पर बिछा देल गेल हे । जेकरा पर लगल हे उन्नैस पात ! हर एक पात पर पीतर के एक थरिया, एक लोटा, एक गिलास, एक साड़ी, एक नम्बर कुर्त्ता ले कपड़ा । चावर-दाल, आलू-केला, सेव-नारंगी, पूड़ी-मिठाय ! मिठाय में लड्डू-जिलेबी-खाजा ! कपटी में रसगुल्ला ।)    (आपीप॰68.14)
88    उपाहि (= उपाह; उपाय) (धन्नू चा कहलखिन - हे जाफरी बाबू, निहोरा करऽ हियो । ओतना में काम बना दहो । अब हमरा कोय उपाहि नञ हो सरकार ! हाजी साहब कहलखिन - कोइ सूरत नहीं है कि बिना दो हजार दिये आपका पैसा निकलेगा । जो दिये तीन हजार वह भी राह राह चला गया समझिये पानी में । धन्नू चा के माथा में जइसे बौल बरि गेलइ ! चरन पकड़ि लेलखिन - जाफरी बाबू, अब एक पैसा हम नै दे सकऽ हियो ! कोय उपाहि लगाभो !)    (आपीप॰120.8, 12)
89    उभैन (= उबहन, उगहन) (भीतर दरवाजा के दोनो तरफ नारियल के गाछ, बाहर पीपर के, अँगना नीक को गोबर माटी से नीपल, चिक्कन छह-छह, घर के इसान कोना में खूब सुन्नर कुँइया, ओकरा पर उभैन लगल बालटी, बगल में तुलसी चौरा, महावीर जी के धजा गड़ल, चन्नन के झमटगर गाछ, घन छाहुर ।)    (आपीप॰7.18)
90    उमक (= उमग, उमंग) (घुरफेर ओकर ध्यान थरिया-लोटा पर घर के समान पर गेल । मुदा एकरा से पटना जाय के खरचे पुरे हइ । अचके जिछना के आँख चमक गेल । ओकरा याद आयल, वहाँ अस्पताल में खून खरीदल जा हइ । डूबइत के तिनका ... इहे उमक पर चल देलक पटना ।; नहिरा के उमक । कनियाय सब कुछ भूल गेली । कहलो गेलइ हे टूटल सवासिन के नहिरे आस । ससुरार तो एक जेलखाना हइ । नहिरा वाला मौज कहाँ ?; कनियाय जे दिन से गेली, एक मिलिट के फुर्सत नञ । चार भाय के एक बहिन दुलारू ! बाबाधाम के माँगल ! साँझे से घर-घर जाको आय-माय के बोलाना । अऽ अधरात तक चिकरि चिकरि को गीत गाना, नाँचना । उमाह के कि कहना । देर तक जगना, बिहान देर से उठना ! मन खराब रहो लगलन ! बुतरू ढिल्ली हो गेल । मुदा उमक में टारने गेली ।)    (आपीप॰4.23; 100.7, 17)
91    उमाह (कनियाय जे दिन से गेली, एक मिलिट के फुर्सत नञ । चार भाय के एक बहिन दुलारू ! बाबाधाम के माँगल ! साँझे से घर-घर जाको आय-माय के बोलाना । अऽ अधरात तक चिकरि चिकरि को गीत गाना, नाँचना । उमाह के कि कहना । देर तक जगना, बिहान देर से उठना ! मन खराब रहो लगलन ! बुतरू ढिल्ली हो गेल । मुदा उमक में टारने गेली ।)    (आपीप॰100.16)
92    उरेहना (सुखराती के बिहान हूर पड़तइ हल । साँझे सब किसान अपन बैल के सींग में तेल लगा लगा उरेह के नैका अपना हाथ से बनावल तरह तरह के फूल वाला फुदना सींग में पिन्हा रहल हे । गारा में नया रंग-बिरंगा जोठ पगहा । बैल के पूरा देह पर चिलिम के छाप, लाल-पीयर-हरियर तरह तरह के रंग में देखैत बने ।; मोहना के आँख में आँसू आ गेलइ । टप-टप चूअऽ लगलइ । चाचा के गोड़ पर गिर पड़लइ ! माँफ करहो काका ! अब बँसिया नञ बजइवइ । अऽ माटी उरेहि को बनायल बँसिया मचान के खंभा पर बजाड़ देलकइ । ऊ चुन्नी-चुन्नी हो गेलइ ।; मनोज बाबू ! अपने देखइ में सुन्नर ! दस बीघा सुत्थर जमीन ! भाय में अकेले ! गाँव में मान-परतिष्ठा ! मागु सुन्नर, पढ़ल, आग्याकारी ! भगवान उरेहि के जोड़ी मेरैलखिन !)    (आपीप॰74.14; 85.2; 102.2)
93    उसरना (= इसोरना) (अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ । गँहूम फटकतइ । चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ !)    (आपीप॰89.11)
94    उसुक-पुसुक (दोस्त-मोहिम खास अगुआ जे बहुत मेहनत से तैयार कैलखिन हल, से कहलखिन - नञ जइभो तऽ लड़का उठि जइतो, हमर दोस नञ ! बरतुहार लगल हइ । ... बाज मत आबो फेर ऐसन संजोग मिलना मोसकिल ! बकि ई थुथुरवा साँप नियर जैसे के तैसे पटायले रह गेला ! तनिको उसुक-पुसुक नञ ।)    (आपीप॰88.14)
95    एकन्त (= एकान्त) (माया हर बार गर्मी छुट्टी में गाँव आवऽ हल, मुदा ई बार जे घर आल ह सेकरा में कुछ विशेष बात हइ । हर बार अकेले आवऽ हल, ई बार लड़का साथी साथ अइलै हे यहाँ तक पहुँचावइ ले । मैया ! देखते माँतर छनक गेलइ ! ओकरा मन में डौट गेलइ ! कहौं अँचरा में तो दाग नञ लगैलकइ रे बाप ! एकन्त में बेटिया से पूछलकइ - ई के हिकइ गे ?)    (आपीप॰86.4)
96    एकसरा (= एक्स-रे) (अस्पताल में ई एक दिन भी नञ जा हथिन इलाज करइ ले । सिरिफ हाजिरी लिखइ ले जा हथिन । रोगी के घरे बोलावऽ हथिन । फीस ले हथिन सौ रूपया । फेर लिखऽ हथिन खून-पेशाब-पैखाना जाँच ! एकसरा-ई॰सी॰जी॰ इ सब जाँच रिपोर्ट लावो । उपर में कहऽ हथिन इ जाँच अमुक जाँच घर से लैइहा, दोसर जगह के हमरा यहाँ मानि नञ हो । ई॰सी॰जी॰ वाला इनकर बहनोइ हिकन ! एकसरा वाला सारा । पेशाब जाँच इनकर साली करऽ हथिन । खून पैखाना जाँच पत्नी । बगल में दवाय दोकान इनकर छोट भाय के हन ! मतलब पूरा परिवार मिल के रोगी के लूटऽ हथिन ! इ कमाय कानून में वैध हइ, अवैध नञ !)    (आपीप॰26.18, 20)
97    एकाएकी (= बारी-बारी से; एक-एक करके) (ई अप्पन बिट्टा से बाँस काटि को खूब बढ़िया मचान गड़ि देलखिन - उपर से निच्चू पलानी भी । मचान के फराटी पर गद्देदार नेबारी के बिछौना । एकाएकी तीन में कोय ओजो रहो लगल । मनोज के छुट्टी मिले तऽ ओजइ गिरल रहथ ।; एक-दू महीना बीतल नञ होतइ कि छउँड़ी के हँसि को बोलइ के आदत ओकर जी के जंजाल हो गेलइ । एक दिन चार गो लफुआ अइलइ - मइया-बेटवा के केप्चर कर लेलकइ, पिस्तौल देखा के, लगभग बारह बजे रात में ! एकाएकी छउँड़ी के बलात्कार करि गेलइ । छउँड़ी बदहोश !)    (आपीप॰106.3; 108.9)
98    एकाबैक (= एकबैग; अचानक) (बगल में सज्जा दान खातिर सज्जा राखल हइ । ओकरा पर पाँचो टूक पोशाक, पलंग ! पलंग पर तोसक, तोसक पर चादर ! उपर से मछड़दानी ! तभी हमरा हँसी आयल ! सरग में मच्छड़ भी रहऽ हइ ? हमरा मुँह से एकाबैक निकल गेल !; बुधना के लगलइ जैसे कोय करेजा में बरछी चुभा देलक । जैसे आकाश से धरती पर एकाबैक गिर गेल । तरे-तर ऐंठि को रहि गेलइ ।)    (आपीप॰68.23; 71.7)
99    एकाह (~ दिन) (धन्नु चा जैसे चिढ़ावइ ले आझ बैठलखिन हल ! मुसुका को कहलखिन - पपुआ माय ! एकाह दिन जो बजार जा हियै - से मे तो बजार के कत्ते लोग जे नहियों चिन्हऽ हइ सेहो, परनाम पहलवान जी ! राम राम खलीफा जी ! अहो, हम मामूली हियै ? दशा-दिशा नर पूजिता !)    (आपीप॰112.12)
100    एकाह (= एकाध) (~ चौतर/ चौतार मारना) (हूर ले पाहुर आ गेल ! ओकर चारो गोड़ मजबूत रस्सी से कसि को बान्हि देलकइ । ओकरा में एक से दू गो नौजवान पैना पेस के उठा लै, आर हूर ... ले हूर ... कह के भैंसिया के सिंघिया भिजुन दै। कोय-कोय भैंस तो पाहुर के किकियाहट सुन के लेह कबड्डी भागइ । कोय भैंस एकाह चौतर मारइ, पाहुर कें कें करइ !; जानऽ हीं, घर में बैठल रहला से देह में घुन्न लग जा हइ । रोज चरावइ ले आवें ! तनी देह में माटी लगायल करहीं, बल बनल रहतौ । डंड-कुश्ती मारहीं ।  नञ रोज अइवें तऽ एक काम करें । तों गइया खोल के हमरा जौर कर दे । एकाह घंटा खेल के चल जो, हम साँझ तक चरइने चल अइबौ । मुदा रोज आवें । बचपन के नगौटिया ! तों आ जाहें तऽ हमरो मन लग जाहे । एइसे मनुआयल रहऽ ही । सीतिया बेस कह के चल गेल ।)    (आपीप॰75.12; 77.11)
101    एक्को (= एक भी) (~ घुन्नी = जरा सा भी) (डाकदर साहब अइला ! नवज छूते मातर भुत हो गेला । "एकरा मछली खिला देलहो ?" - "जी नञ सरकार ! एक्को घुन्नी नञ !" जिछना बोलल । - "तब बोखार कइसे पलट गेलइ ?")    (आपीप॰3.6)
102    एक्स (~ होना = बात समाप्त या रद्द करना) (से दिन से किरानी बाबू माया के वर खोजो लगला । जहाँ-तहाँ इष्ट मित्र, गोतिया-परोसिया से कहना शुरूह कैलका । भला किरानी बाबू के बात ! के चलाय । तरह-तरह के लड़का बतायल गेल । आइ॰ए॰एस॰, पी॰सी॰एस॰, बी॰पी॰एस॰ - ऐसन कत्ते एस॰ लगल लड़का के पास गेला । ओकर माँग सुन के आर अपन औकात तौललका कि अपनै एक्स हो गेला ।)    (आपीप॰87.14)
103    एगारह (= ग्यारह) (उठ बन्दा, चल परसंडा, से चल देलूँ । जेठ के महीना । चलैत-चलैत दस एगारह बज गेल ।)    (आपीप॰6.25)
104    एजो (= एज्जा; इस जगह, यहाँ पर) (टमाटर रोपा हो गेल । केरौनी चलो लगल । ओकर मइया कहलकन - मनोज बाबू ! एजो एगो मचान गड़ि दहो । बाँग-बारी चीज बिना अगोरने ? के जाने, कखने कने से कि चल आवे । हम दिन भर माटी में रेटऽ ही । ओकरा कि लगतइ । एक छन में सब कैल-धैल चौपठ ।)    (आपीप॰105.23)
105    एत्ते (= इतना) (कहलियौ ने, हमर माथा एत्ते नञ भुकाव । अब जाने तों, नञ जानौ तोर काम । पुष्पी  घर लौट गेल । चुपचाप घर के पलंग पर तकिया में मुँह छिपा के सुबक-सुबक के कानो लगल, पूरा तकिया लोर से भींज गेलइ ।)    (आपीप॰14.16)
106    एन्ने (= इधर) (तभी चिकुलिया बोललइ - असल में अब एन्ने छाँड़न हो गेलइ । मरल मरल धार चलऽ हइ । मुरदवा अइतइ कि ? बुढ़ी कहऽ हथिन - कभी ई घाट के चलती हलइ । रात दिन मुरदा जरैत रहऽ हलइ ।)    (आपीप॰32.3)
107    एन्ने-ओन्ने (अचके जिछना के आँख चमक गेल । ओकरा याद आयल, वहाँ अस्पताल में खून खरीदल जा हइ । डूबइत के तिनका ... इहे उमक पर चल देलक पटना । जिछना सबसे पहले अस्पताल पहुँचल जजा खून खरीदल जा हल । खून बेच के खड़-खड़ौआ पाँच सौ रुपइया नगदी फाँड़ा में खोंस एन्ने-ओन्ने देखले दवाय के दोकान पर जा रहल हल ।)    (आपीप॰4.25)
108    एसकर (~ में = अकेले में) (महेश धन्नू चा के एसकर में बोला को कहलकइ - दादा, सबेरे चलइ के चाही । जाफरी साहब के डेरवे पर पकड़वइ । ओजो बतियावै में बढ़िया रहतो । अपीसवा में कत्ते ने लोग हो जइतो, औन-मौन, बढ़ियाँ से नञ बात होतो ।)    (आपीप॰118.20)
109    एसकरूआ (= एकसरूआ; अकेलुआ; अकेला) (मान ला पैसा होइयो जाय बकि नगर भोज मामूली चीज नै हइ, ओकरा सम्हाड़ना बड़ा कठिन काम ! कोय कहलक - अपने एसकरूआ । पिण्डे में लगल रहतइ । गोतिया ओकर कैसन हइ से केकरा नै मालूम हइ । बाबा भरोसे गदका !; बुधना अन्दर से खीझ गेल । बेकार ई फेरा में फँसलों । ई सब हिकइ आदमी वाला के जे पाँच गो हइ । हमरा नियर एसकरूआ के नै हिकइ । अब तो ई गुड़ खइनै कान बिहैनै । करमठ के काम खतम हो गेल । अब भोज के बारी हे ।)    (आपीप॰67.7; 70.4)
110    एसकरे (= एकसरे; अकेले) (मंत्री जी मुसकुरा को पूछलखिन - कि काम हलइ ? सूपन सारी नोसो से कह सुनइलखिन । मंत्री जी सुन के हँसलखिन । हँसते-हँसते कहलखिन - अलगंठे एसकरे निगलि जाय ले चाहऽ हहो ! दू लाख ! एसकरे खइभो तब पचतो ? अरे ! बाँटि-चुटि के खाय राजा घर जाय, तभी ने ? नञ तब जेल के तैयारी करहो !; शहरी दमाद यहाँ जइभीं ! रात के बाद परात होते ओकर चिन्ता बढ़ जइतै । बाप रे ! कि जन ई कत्ते दिन रहतइ ! ... ऊ शहरी एक सो ग्राम चावर खैतौ । तों देहाती, जइभीं, दुइयो के बदली एसकरे भकोसि जैभीं ! दमदा कहतौ बेटिया से ई डोलइ के नाम नय लऽ हइ ।)    (आपीप॰40.11; 92.2)
111    ऐंगना (= अँगना; आँगन) (किसान लड़का के खोज होवो लगल ! संजोग से मिल गेल । बीस बीघा हिस्सा, दुआर पर टरेक्टर मैसी - फारगूसन । घर दोबारा पक्का पोस्त ! बाहर भीतर पलिस्तर ! ऐंगना भी पलिस्तर ।  कहैं माटी के दरेस नञ । ऐंगना में चाँपाकल, पैखाना, घर में टी॰भी॰ रेडियो कि नञ जे सब सामान होवऽ हइ । खेत में नहर-टीवेल । सालो भर सब तरह के फसील !)    (आपीप॰88.24; 89.1)
112    ऐडिया (= अइडिया; आइडिया, अन्दाज) (विचार भेल - सबसे पहिले तो ई पता हो जाय कि हमरा गाँव में कत्ते आदमी हइ, बूढ़ा-बुतरू, औरत-मर्द, जवान ! ओकर बाद में समान के लिस्ट ! कतना आदमी के खिलाना हइ पहिले ई तो ऐडिया मिल जाय ।)    (आपीप॰67.13)
113    ऐनौक-औनौक (= एन्ने के - ओन्ने के) (आयल फागुन । अनरुध आ गेला । घर में खैलका । हाथ पोंछने मित्र भिजुन गेला । दोनो दोस्त गले-गले मिलला । कुछ ऐनौक-औनौक, कुछ देश-देशान्तर के खिस्सा । कुछ हाल-चाल । फेर मनोज अप्पन दुख के पुरान उलटे लगला । पुरान उलटते आँखि से ढब-ढब लोर गिरो लगल !)    (आपीप॰103.12)
114    ऐसन (= अइसन) (जिछना पहिले ऐसन नञ हलइ, की जन दस दिन में एकरा की हो गेलइ है ?)    (आपीप॰1.6)
115    ओंग (= ॐ) (सुबह-सुबह सूपन भगत गंगा नहा के गंगा के किनारे के पीपर गाछ के नीचे सावा हाथ धरती नीप के, माटी के मसानी बाबा बना, स्थापित करके, मुरदा वाला लकड़ी में लह-लह आग बना के, धूप दियो लगला - ओंग नमो मसानी बाबा । सोहा !; फेर ऊ धूप दियो लगला - ओंग माय काली नमो सोहा ! फेर पाँच बेरी धूप देके गोड़ लग के काली माय से कहलकन - आँय ! माय काली ! एत्ते तो खोंटा-पिपरी नियर धरती पर आदमी जनमि गेलइ ! एकरा काट-वाछ नञ करभो तब जुलुम हो जइतइ, माता ।)    (आपीप॰31.3, 12)
116    ओकरा (= उसे, उसको)  (ई बात कही केकरा ? मन के मीत भिजुन जब मन के बात खोलल जा हइ, तब दुख कुछ हल्का हो हइ । ओकरा सिवाय कोय ऐसन मीत नञ हलन जेकरा भिजुन खुलि को रो सकऽ हथ !)    (आपीप॰103.9)
117    ओक्के (= ओके, OK) (इसटिमिट बन गेल - दू थान ! लड्डू-जिलेबी, पूड़ी-तरकारी, आलू-परवल के रतोवा ! दही-चीनी रेड़म-रेड़ ! बस एकरा से जादा नञ ! सब कगज पर लिखा गेल - नोन से हरदी तक, पत्तल से गिलास भर, राबा से रत्ती, कुछ छूटइ के नै चाही । नै छूटल, ओक्के हो गेल । पंच के मोहर लग गेल । अनुमानतः एक लाख ! दस हजार हाथ में राखो, उपर से घटल-बढ़ल !)    (आपीप॰67.19)
118    ओजइ (= ओज्जे; उसी जगह) (गुलामगढ़ से आजादनगर जाय में कुछ हइ ? तीरे-कोने मुसकिल से तीन कोस । तोरा शहरी बाबू ले दस कि॰मी॰ । हम तो रोज करीब-करीब ओजइ से दूध ले के आवऽ ही, एक घंटा के रसता ।; ई अप्पन बिट्टा से बाँस काटि को खूब बढ़िया मचान गड़ि देलखिन - उपर से निच्चू पलानी भी । मचान के फराटी पर गद्देदार नेबारी के बिछौना । एकाएकी तीन में कोय ओजो रहो लगल । मनोज के छुट्टी मिले तऽ ओजइ गीरल गिरल रहथ ।)    (आपीप॰6.12; 106.4)
119    ओजो (= ओजा, ओज्जा; उस जगह) (ऊ उठल, सुतली रात में सान्ही-कोना खोजो लगल । खुर-खुर के आवाज सुन के भइया जागलइ । पूछलकइ - की करऽ हीं गे ? मइया देखहीं ने, कनबलिया वाला डिब्बा जजो धैलियै हल ओजो नञ हइ ।; बाप-दादा के बनल-बनावल घर बेच देभीं उ लेतइ माटी के मोल, हम जानऽ हियौ ! उहे तो ओकर साजिशे हइ ! चारो तरफ से घेर के तोरा मजबूर कर देलकौ ! जे में ई भाग जाय ! कहाँ जा के घर बनइभीं ? पैसा दे देतौ, तों भागल बुलें । पैसवा डगरे-डगर खर्च हो जइतौ । तों नट-गुलगुलिया नियर सिरकी तानने बुलें ! हम ओकरे काहे नञ भगा देवइ ओजो से, हम काहे भागवइ ?; महेश धन्नू चा के एसकर में बोला को कहलकइ - दादा, सबेरे चलइ के चाही । जाफरी साहब के डेरवे पर पकड़वइ । ओजो बतियावै में बढ़िया रहतो । अपीसवा में कत्ते ने लोग हो जइतो, औन-मौन, बढ़ियाँ से नञ बात होतो ।)    (आपीप॰15.15; 28.19; 118.21)
120    ओजौका (= ओज्जा वाला; वहाँ वाला) (तोरा टीवेल भिजुन खेत हइयै हो । ओजौका दू बीघा खेत टेबि को जेकरा जिमा नया माल हइ, ओकरा बटैया दे देहो । कड़ैती नञ, कसरैती नञ, कंजूसी नञ, हिसाब-किताब नञ । दुलार करहीं, पोछैत-पाछैत मुँह खाय, आँखि लजाय ! राजी हो जइतइ । जब तक नया हइ, रहतइ, पुरान होतइ, घर जायत । आर कि ?)    (आपीप॰104.15)
121    ओझरल (= ओझराल; उलझा हुआ) (ई ओकर ओझरल लट सुलझावो लगलखिन । ओकरा सायत अच्छा लगलइ । ई पीठ पोछो लगलखिन । ऊ मुसका देकइ । हिनकर मन बढ़ गेलइ ।)    (आपीप॰107.12)
122    ओझराना (= उलझना; उलझाना) (हे बेटा ! जनिऔरी जात लक्ष्मी हथिन, लछमी ! जिनका से ई पिरथमी चल रहलइ हे । ऊ पूजय के चीज हिखिन । ओकर चेहरा नञ देखी, आँख नै मिलाबी । आँखिये से तो उ सब गुण बान ओझरइवे करऽ हइ । अगर औरत के देखो पड़े तऽ ओकर गोड़ देखइ के चाही ।)    (आपीप॰77.23)
123    ओटी (पुष्पी कभी-कभी एकान्त में अप्पन ओटी से ले को पूरे कमर पर हाथ फिरावे, चारो तरफ, तऽ एक भयावह भविस से आतंकित हो जाय । अपना आप में बुदबुदावे । बाप रे ! कमरिया चिक्कन लागऽ हइ, कहीं धर तो नञ लेलकइ ? छौड़ा पूत्ता ! भाय-बहिन में ऐसन ... नञ सुनलो हल ! से हमरे पर बीत गेल कि ?)    (आपीप॰12.1)
124    ओतना (= उतना) (लगभग पचीस साल के उमर में हुनकर मागु हुनखरा छोड़ के चल गेलखिन वहाँ ! जहाँ से कोय लौट के नञ आवऽ हइ । एक साल हुनकर रोवैत बीत गेल !याद के पुलिन्दा के बीच ... जब आबइ हलों हँसि को मिलइ हल । बगल में बैठ के परेम से बात करइ हल । मीठ ! गुड़ो से मीठ बात ! ओतना मीठ कि रसगुल्ला होतइ !)    (आपीप॰102.10)
125    ओते (= ओत्ते; वहीं) (बेटा कहलकइ - कहिया ओकरा सजाय देथिन कि नञ देथिन ? तों देखवें कि नञ देखवें ? भगवानो अमीरे के पच्छ में रहऽ हथिन ! हमरा गरीब ले कोय नञ ! ओते गाँव में आदमी हइ ! एकाध गो तोर साथी जौराती भेलो ? पंच खोजल्हीं, मिललो ? जे मिललो, मुँहदेखवा ।)    (आपीप॰28.25)
126    ओत्ते (= उतना) (एतना से हम खुद सन्तुष्ट नञ ही, तों कने से सन्तुष्ट भेल होवा ? ई विषय गंभीर आव बड़गो है । हमरा पास ओत्ते लिखइ ले ई किताब में जगह नञ है ।)    (आपीप॰V.26)
127    ओन्नइ (= ओनहीं; ओधरे; उधर ही) (भोरे भोर दौड़ पड़लइ, ओन्नइ जने से ई अवजवा आवऽ हलइ । गुनगुनावैत ! के ई बँसुरिया बजा दे हइ ...।)    (आपीप॰81.15)
128    औकात (नरेश बाबू हुनकर मित्र में से हथिन । जिगरी दोस्त । हुनका एक दिन सारे नो सो से एगारह तक समझा देलखिन । खोल के अपन औकात बता देलखिन । नरेश बाबू सब सुन के कहलखिन - नौकरी वाला दुल्हा के गलबात छोड़ो !; हिनकर औकात के लायक पट गेलन ! आको अपन मागु के सारे नोसो से कह सुनैलका ! मागु बिगड़ गेलन । गरजबे नञ कैलन, बरस गेलन ! मर्रर्र दुर्र हो ! एकर मती मारल गेलइ ! जब इहे करै के हलौ तब ओकरा पटना में काहे ले पढ़ैल्हीं ?; ओकर बाप से मिलके चले कहवै । जब छौड़ा-पूत्ता एकरे ले भूखल हइ तऽ बियाहे कर लिये । करे जत्ते मन होवइ । … दुओ माय-बेटा बलात्कारी के बाप के जाको कहलकइ । ओकर बाप तैश में अइलइ मुदा परेम से बैठा को समझैलकइ ! देखो ! बैर-बियाह जोड़ी । हमरा भिजुन आवइ से पहिले अपन औकात तौलि लेल्हो ?)    (आपीप॰88.16; 89.4; 109.13)
129    औकाद (= औकात) (नरेश बाबू सब सुन के कहलखिन - नौकरी वाला दुल्हा के गलबात छोड़ो ! कोय सम्पन्न किसान के करो । तोहर जे औकाद हो ओकरा से किसाने फीट बैठतो । सोचहो ने तनी, किसान के कि के कमी हइ । खाय के हर चीज तो किसाने के पास हइ । दूध, फल, तरकारी, सब तरह के अनाज । आर पैसो । तनी टोनगर देख के दस बीघा वाला के सम्पन्न हिया के कर ला ।)    (आपीप॰88.18)
130    औडर (पाँचो के फुल औडर मिल गेल । जतना मडर होय कोय परवाह नै, तोर बाल बाँका नै होवो देवो । डरना-घबराना नै ।; इनरदेव बाबू बिना कुछ कहने सुनने दरखास में औडर सीट लगा के दसखत जे करइ के हलइ करिको जिमा लगा देलखिन ।)    (आपीप॰63.5; 117.13)
131    औन-मौन (महेश धन्नू चा के एसकर में बोला को कहलकइ - दादा, सबेरे चलइ के चाही । जाफरी साहब के डेरवे पर पकड़वइ । ओजो बतियावै में बढ़िया रहतो । अपीसवा में कत्ते ने लोग हो जइतो, औन-मौन, बढ़ियाँ से नञ बात होतो ।)    (आपीप॰118.22)
132    कँहड़ना (= कँहरना) (जे बुढ़िया जीवन भर कंजूसी से पेट काट के पैसा-पैसा जोड़लक सेहे पैसे आझ लुटायल जा रहल हे, ओकरा सरग में सुख पहुँचावइ ले ! सरग तो बाद, बुढ़िया सुनतइ हल तऽ ओकर आतमे कँहड़ि जयतइ हल । बुढ़िया खुद जो एखने जीयत होत हल, तब ऊ दोसरा के कपार फोड़ देत हल ! नै फोड़ सकत हल तऽ अपनो जरूर फोड़ लेत हल !)    (आपीप॰68.11)
133    कछौटा (= धोती का कमर में खोंसा जाने वाला भाग; पिछुआ; ढेंका; लाँग) (~ के पक्का) (हमर जोड़ी भारती देवी हइ । जवानी में ऊ चह-चह करऽ हलइ । कतनो लोग चहलखिन मुदा ऊ कछौटा के पक्का । तनी एक नै हिललइ ।; शुरूह में बरतुहार अइलइ - मुदा साफ जबाब दे देलखिन । हमरा सोना सन दू बेटा ! आँखि में पाँखि । बियाह करि को एकरा फाँसी चढ़ा दिये ? खिला-पिला के बिदा करि देथिन । संसार में उनखर परसंसा होवो लगल । हुनकर चलित्तर के सराहना ! बस !! बेटा कहीं मनोज ! नान्हें वैस में मागु मरि गेलइ ! चब्बोस ! कछौटा के पक्का कही कलयुग के भीष्म पितामह ।; अनरूध समझैलकन - मनोज धीरज धर ! कछौटा बान्ह ! तोरा राम-लछुमन दू बेटा । संसार कि कहतौ ? बियाह करभो बुढ़ारी में ! नतीजा ! कहावत में हइ - रात के तेल लगावी गेनरा ले, बुढ़ापा के बियाह दोसरा ले । अऽ बेटवा हो जइतो दुसमन !)    (आपीप॰10.22; 102.23; 103.22)
134    कज-भंड (घर आको दुन्नु के बोलैलकइ । कहलकइ - चाचा ! कौन जनम के दुश्मन हलियो ! अच्छा बैर सधैल्हो ! खर्च भी, कज भंड भी ! आठ आना ले एक टोपी बिना विधान नञ पूरा भेलइ । आर अन्हरा मनसुखवा भूखले रहि गेलइ ! दुइयो दिन !)    (आपीप॰72.12)
135    कजो (= कज्जा; किस जगह, कहाँ) (भोज में शिकायत नञ होवो दै के बरत लेको ओजो से उठला । वहाँ से आको सब सलाहकार भंडारी के, परसैनिहार के, अऽ बिजै करैनिहार के टरेनिंग देको अप्पन-अप्पन काम निजगूत करि देलका । आखिर ! बरहा से तेरहा तक खतम हो गेल । भोरे उठि को बुधना गाँव में टहलो लगल । इहे समझइ ले कि कजो के कि कहइ हे ।; मनोज टेंटुआ लोर ढारैत कहलका - भैवा ! कजो मिलऽ हइ ? कइसे मिलऽ हइ ? हमरा तो आय तक एको गो नञ मिलल । केकरा कहों ? कि कहों ?)    (आपीप॰70.13; 104.12)
136    कड़मड़ाना (मन ~) (चलल जा हलइ । पंचू मिललइ । बुधना पुछलकइ - कि पंचू ? कैसन रहलइ ? खइला हा खूब ? पंचू कहलकइ - अच्छे हलइ नुनु । तनी बरहवा दिन अलुआ वाला तरकरिया लागइ काँचे रहि गेलइ हल । अऽ तेरहवा दिन दलिया शायत तनी लगि गेलइ हल, तनी जराइन लागइ । बुधना के मन भीतर-भीतर कड़मड़ा गेलइ ।; बिहान महेश पपुआ माय भिजुन आयल । सारी नो सो से समझा देलकइ । पपुआ माय भीतर से कड़मड़ा गेलइ । कि कहऽ हो महेश ? तीन हजार ... मर दुर्र ... हो ... ई तो दीना दीनी डकैती भेलइ ! बम पिस्तौल से नञ लूटऽ हइ, कलम के मारि मरऽ हइ । गे मइयो रे ! छउँड़ा पुत्ता ... नञ लेब रूपइया ! करजे ने होत, जाय भँगलाहा ।)    (आपीप॰70.22; 118.9)
137    कड़र (= कड़ा) (एक दिन चार गो लफुआ अइलइ - मइया-बेटवा के केप्चर कर लेलकइ, पिस्तौल देखा के, लगभग बारह बजे रात में ! एकाएकी छउँड़ी के बलात्कार करि गेलइ । छउँड़ी बदहोश ! भैवा कहलकइ - चल मैया । बलात्कार के केस नामी होवऽ हइ । बड़ी कड़र । चारो के हम चिन्हऽ हियै । कर दियै केस ।)    (आपीप॰108.11)
138    कड़र-काठ (घर लौट रहल हल । एक छपरी तर कुछ लोग इहे भोज के चरचा कर रहलखिन हल । बुधना छुप के सुनो लगलइ । एगो कहलकइ - सब तो अच्छे हलइ मगर खजवा में बोर नञ हलइ । दोसर कहलकइ - जिलेबिया लगइ कड़र-काठ जैसे तीसी तेल के होय । तरकरिया तो तनिको अच्छा नञ लागइ ।)    (आपीप॰71.11)
139    कड़ैती (तोरा टीवेल भिजुन खेत हइयै हो । ओजौका दू बीघा खेत टेबि को जेकरा जिमा नया माल हइ, ओकरा बटैया दे देहो । कड़ैती नञ, कसरैती नञ, कंजूसी नञ, हिसाब-किताब नञ । दुलार करहीं, पोछैत-पाछैत मुँह खाय, आँखि लजाय ! राजी हो जइतइ । जब तक नया हइ, रहतइ, पुरान होतइ, घर जायत । आर कि ?)    (आपीप॰104.16)
140    कतना (= केतना; कितना) (विचार भेल - सबसे पहिले तो ई पता हो जाय कि हमरा गाँव में कत्ते आदमी हइ, बूढ़ा-बुतरू, औरत-मर्द, जवान ! ओकर बाद में समान के लिस्ट ! कतना आदमी के खिलाना हइ पहिले ई तो ऐडिया मिल जाय ।)    (आपीप॰67.13)
141    कत्ते (= कितना) (हम्मर गाँव के सबसे बूढ़ वन्दे चा से पूछलियन - चाचा ऐसन बाढ़ देखल्हो हल ? तऽ शुरूह में दू चार दिन ई बिगड़ते रहलखिन - "कहिया गीदर गाँग नहइलक रेऽऽ ? तूँ देखवे कि कइलें रे ? सावन में जनमलें, भादो में देखले बाढ़, तऽ कहलें कत्ते पानी ! इ बाढ़ नञ, बाढ़ के पुच्छी हे । ..."; शहरी दमाद यहाँ जइभीं ! रात के बाद परात होते ओकर चिन्ता बढ़ जइतै । बाप रे ! कि जन ई कत्ते दिन रहतइ ! ... ऊ शहरी एक सो ग्राम चावर खैतौ । तों देहाती, जइभीं, दुइयो के बदली एसकरे भकोसि जैभीं ! दमदा कहतौ बेटिया से ई डोलइ के नाम नय लऽ हइ ।; ठीक हइ, घूस में पैसा लागतौ ! पाछू हमरा नञ कहिहें । पैसवा खरच होवऽ हइ तब तोरा देह में नोचनी लागो लगऽ हौ । - कहवै कि ? कत्ते लगतइ ? हजार-दू हजार । तब निकलवो तो करतइ - बीस हजार । रहे दू हजार कम्मे छौड़ा पूत के ।)    (आपीप॰1.12; 92.1; 114.1)
142    कद-काठी (मनोज बाबू ! अपने देखइ में सुन्नर ! दस बीघा सुत्थर जमीन ! भाय में अकेले ! गाँव में मान-परतिष्ठा ! मागु सुन्नर, पढ़ल, आग्याकारी ! भगवान उरेहि के जोड़ी मेरैलखिन ! समय के साथ - दू बेटा ! बेटा कही बेटा नियर ! जैसन माय-बाप वैइसने ! कद-काठी के - लगे जइसे दुओ जौंआँ होय ।)    (आपीप॰102.3)
143    कनकट्टी (कनियाय जब सवारी चढ़ली - मने मन छगुनैत गेली । कने से कनकट्टी बुढ़िया, झाँझी कुतिया माइयो ! बचलइ हल जतरा भगन करइ ले । हमरा पर तो जर-जिद से पड़ल हइ माइयो ! नाग-नागिन के चावर चिवैलकइ हल ! बुढ़वा डाही, भले बुढ़वे जौरे इहो मर जइतै हल । लगऽ हइ उ जनम के हमर सौतिन हलइ, माइयो !)    (आपीप॰99.9, 12)
144    कनकन (~ सोरा) (मुदा वीसो वाला टिल्हवा पर जइसैं पहुँचलइ - पच्छिम रूख के पछिया के जबरदस्त झोंका करेजा में लगलइ ! देहे सिल्ल हो गेलइ । ठंढा बरफ, कनकन सोरा । आगू नञ बढ़ सकलय, घुर गेलइ अकेले ।)    (आपीप॰81.18)
145    कनमटकी (~ पारना) (फुलवा के सबेरे रोटी आव आलू के कुच्चा खिला के सुता देलक हल ! मुदा फुलवा के आँखि में नीन कहाँ ? भूँजल मछली के गंध जो नीन आवो दिये ? ... कनमटकी पारले रह गेल फुलवा । जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल ।)    (आपीप॰2.12, 13)
146    कनियाय (अग्गे माय ! झखुआ मागु सन जबरदस्त जनिऔरी नञ देखलों हें । लाख कहैत रहलियै ! कनियाय ! एकादसी हमरा नञ धारे हे । एकादसी कइलैं हमर झखुआ के बाप अकाश उड़ गेला । से दिन से हम एकादशी के शुभ काम नञ करऽ ही । दोसर कोय तिथि में जइहा, कोय हर्ज नञ !; कनियाय जब सवारी चढ़ली - मने मन छगुनैत गेली । कने से कनकट्टी बुढ़िया, झाँझी कुतिया माइयो ! बचलइ हल जतरा भगन करइ ले । हमरा पर तो जर-जिद से पड़ल हइ माइयो !)    (आपीप॰98.10; 99.9)
147    कने (= कन्ने; किधर) (मिनिसटर साहब गरम हो गेलखिन । कहलखिन - कुल पागलपन झाड़ि देवो ! होश में बात करो । कलेट्टर कहलकइ - होसे में हियै ! हमर नौकरी तो नै खा सकऽ हो, बदली ले हर-हमेसे बोरिया-बिस्तर बान्हने रहऽ हियइ । एतना कह के फोन रख के दू चारि गारी देलकइ - साला, बहिन ... ई सब अथायल-वथायल कने से मंत्री बन के राज के पैसा लूटइले ... !)    (आपीप॰41.14)
148    कने-कने (= कन्ने-कन्ने; किधर-किधर) (करेजा थाम्ह के सुनहा, बात बढ़िया नञ हो ! पुष्पी के गोड़ भारी हो ! - आँय ! पुष्पी के ? कइसे ? कहाँ से ? - कहलियो ने ! ऊ जग्गा देखइ ले नञ गेलइ हल ? मोहना जौरे, ओकरे में रात हो गेलइ । कने कने ऊ, किदो रेस हाऊस होवऽ हइ ! ओकरे में सुतैलकइ आर बलात्कार कर लेलक ।)    (आपीप॰18.10)
149    कन्ने (= किधर) (भइवो एकर कैसन ! कन्ने अइलइ, कन्ने गेलइ ! भर नजर देखवो नञ कैलियइ । कुछ कहियै, सुनइ ले नञ तैयार । कहि दै हम एखनै जा हियौ । कहि दे हम एखनै चलऽ हियौ ! मर्रर्र दुर्र हो ! एइसौं करऽ हइ आदमी !)    (आपीप॰98.15)
150    कपटी (= मिट्टी का प्याला) (उन्नैस हाथ लम्बा, दू हाथ चौड़ा, मारकिन के कपड़ा, गोबर से नीप जगह पर बिछा देल गेल हे । जेकरा पर लगल हे उन्नैस पात ! हर एक पात पर पीतर के एक थरिया, एक लोटा, एक गिलास, एक साड़ी, एक नम्बर कुर्त्ता ले कपड़ा । चावर-दाल, आलू-केला, सेव-नारंगी, पूड़ी-मिठाय ! मिठाय में लड्डू-जिलेबी-खाजा ! कपटी में रसगुल्ला ।)    (आपीप॰68.17)
151    कमाना-कजाना (पुष्पी कहलकइ - एक काम कर तों, हमरा से बियाहे कर ले । यहाँ नञ बनौ तब चल कहैं बाहर । दुइयौ जवान ही । कमा-कजा के बचवा पाल लेवइ ।)    (आपीप॰13.18)
152    कमाय (= कमाई) (जनता के गाढ़ी कमाय के रुपैया एकरा दरमाहा में जा रहलइ हे । अऽ दरमाहा तनी मनी नञ, दस हजार, बीस हजार । तइयो इ घूस ले बेकल हइ ।; ई॰सी॰जी॰ वाला इनकर बहनोइ हिकन ! एकसरा वाला सारा । पेशाब जाँच इनकर साली करऽ हथिन । खून पैखाना जाँच पत्नी । बगल में दवाय दोकान इनकर छोट भाय के हन ! मतलब पूरा परिवार मिल के रोगी के लूटऽ हथिन ! इ कमाय कानून में वैध हइ, अवैध नञ ! होय के चाही अवैध ।)    (आपीप॰25.15; 26.23)
153    कमीच (= कमीज) (छउँड़ी सलवार फराक पिन्हऽ लगलइ । मइया कहलकइ - दुर ने जाय ! छिछियैली ! ई लदर-फदर ... एकरा पिन्ह के रोपइ में बनतौ ? पेन्ह ले घंघरिया आव उपर से अधबहिमा कमीचवा । सेकर उपर ओढ़निया ले ले । छउँड़ी सेहे कइलकइ ।)    (आपीप॰105.13)
154    करकी (= काली) (कोट के बीचोबीच में एक सफेद मूर्ति खड़ी हइ । ओकर आँख पर करकी पट्टी बान्हल हइ । आर ओकरे हाथ में इन्साफ के तराजू हइ । मतलब कानून आन्हर हइ, बहिर हइ, यहाँ के चपरासी से लेके जज तक ।)    (आपीप॰24.19)
155    करता (= कर्ता; दाह-संस्कार में मुखाग्नि देने तथा श्राद्ध करनेवाला) (होवो दा नगर भोजे सही । मगर एक बात । हम अकेलुआ, से हो करता । हमर समय पिण्डे दै में बीत जइतो । तों कुल्ले नै एकरा में लगभो । अगर कसरइती कइल्हो तो ई काम नै सम्हड़तो ! तब समझो कुल गुड़ माटी । वंस के नाम कि होता आर जिनगी भर बदनामी के कलंक माथा पर । पैसा के कोय सवाल नै हइ । सवाल हइ एकरा सम्हाड़इ के ।)    (आपीप॰66.19)
156    करब (बिहान भेलइ । सूपन फेर उहे तरह से गंगा नहा के सब देवी देवता के पूजा करके वरदान माँग के घर अइला । चिकुलिया सूपन पर बिगड़लइ - अभी ई एजइ अघस-मघस करब करऽ हइ । दुर ने जाय । ई दारूबजवा, ई कुच्छो नञ करतइ ।; चाचा बैठला कुछ देर । देखइ होथि - उहे सब दरखास तो हिकइ ! ई भीतरे भीतर कुरोधि गेलखिन । कहलखिन - अहो बोलो ने, कत्ते घूस लेवा ? कुल के करब करऽ हो अऽ हमरा ठकब करै हा ।)    (आपीप॰38.7; 116.15)
157    करमचारी (= कर्मचारी) (दोसरा नम्बर में देखल जाय ! डाकदर-इनजीयर-ओभरसीयर नौकरी लगल वाला ! बिना नौकरी वाला तो कत्ते मारल बुलऽ हइ ! बिना नौकरी वाला बतौर मजूर समझो । उहो कै गो बतायल गेल - मुदा टँगरी नञ ठहरल । तेसर नम्बर पर आयल ! बैंक करमचारी, मास्टर-किरानी आदि ! चौठा नम्बर पर सिपाही ! पचमा में किसान लड़का खोजल गेल !)    (आपीप॰87.19)
158    करमठ (= कर्मकांड, पूजा-पाठ, यज्ञ, श्राद्ध आदि की विधि) (बुधना अन्दर से खीझ गेल । बेकार ई फेरा में फँसलों । ई सब हिकइ आदमी वाला के जे पाँच गो हइ । हमरा नियर एसकरूआ के नै हिकइ । अब तो ई गुड़ खइनै कान बिहैनै । करमठ के काम खतम हो गेल । अब भोज के बारी हे ।)    (आपीप॰70.5)
159    करामत (= करामात) (जाड़ा के दिन । साँझ के समय । धन्नू चा चुल्हा तर बैठि को पपुआ माय से कुछ के कुछ कहैत, रहस मारैत, कहलखिन - से कि समझऽ हीं पपुआ माय ? हमरा मामूली आदमी ! हम बाहर खिड़ँयजा नञ हियौ से से, नञ तो हम देखा दियौ अप्पन करामत ! हम केकरा से कमि को हिये तोरा लखे जे हो जाय ! पपुआ माय केहुनाठी से धक्का दैत कहलकन - हटो जी ! आँचो लगावो देवा कि नञ ? चाचा तनी सा हँट गेलखिन ।)    (आपीप॰112.3)
160    करूआ (~ तेल) (तेल करूआ अइतन एक सौ गिराम ! दू बेरी में साफ ! डिब्बा में दालि ! डिब्बा में आँटा ! सब डिब्बा बन्द ! बेटी कत्ते खैतौ ? बाल-बच्चा होतन ! तबाह हो जइतौ ! भूखला के भूखले ।)    (आपीप॰91.4)
161    करैनिहार (= करनिहार, करने वाला) (भोज में शिकायत नञ होवो दै के बरत लेको ओजो से उठला । वहाँ से आको सब सलाहकार भंडारी के, परसैनिहार के, अऽ बिजै करैनिहार के टरेनिंग देको अप्पन-अप्पन काम निजगूत करि देलका ।)    (आपीप॰70.11)
162    कल (= कर, हाथ) (~ जोड़ना) (चुनाव के समय अइतो तब नेता अइतो ! दूरे से कल जोड़ने ! गोड़ लागी सूपन दा, तोहरे पर आसा दादा ! दाँत खिसोड़ि को बैठि जइतो । उहे मुरदवा वाला खटिया पर ।)    (आपीप॰32.13)
163    कलेट्टर (= कलक्टर) (चुकुलिया सुनलकइ कि दू लाख कलेट्टर गछलकइ, तब जाम छूटलइ । सुनते माँतर सूपन पर बिगड़ गेलइ, कहलकइ - यह-यह मोलनमा के करनी । चीज हम्मर, कत्ते मेहनत से गंगा जी से उपर कइलों । हमरा भीखमंगी कर के मिलल एगारह सौ । ऊ हमरे वाला लहसवा चोरा के कमइलक दू लाख । हम तखनइ पोल खोलऽ हलियइ ! कलेट्टर रूपैया देतइ हल ? पुलिस मारते हल चूतड़ पर चार लाठी ।; इ दरखास पढ़ के कलेट्टर के दिमाग चकरा गेलइ । पढ़ के अपने आप बोललइ - अच्छा, ई बात ?)    (आपीप॰37.16, 19; 39.2)
164    कलौआ (चलो दादा, एजइ सुत रहब ! बहुत आदमी तो सुतल हइ, उपर से दिन नियर इंजोर, सुरक्षा ले सेवा सन्ती ! परवचन भी सुनब, खाय ले कलौआ हइये हइ । कि परवाह ।; ले गेलइ रेस्ट हाउस, दुमहला कोठा पर, एगो कोठली लेलकइ - गद्दा-बिछौना बिजली-पंखा । ओजइ खैलकइ, हम तो अप्पन कलौआ खइलौं ।)    (आपीप॰16.23; 17.2)
165    कसमसाना (ऊ फेर उहे तरह से मचना डोला के भागऽ लगलइ ! ई दौड़ के पछुए से भर अँकवार पकड़ लेलकइ ! कहलकइ - अब कहाँ यार ! के हँ तों ? सोहगी हँसो लगलइ ! कहलकइ - मचना भूत डोलैलकौ कि हम ? मोहना कहलकइ - भूते के पकड़ने हियै कि तोरा ? सोहगी अपना के ओकर पंजा से मुक्त हो को भागइ के कोरसिस कैलकइ । बकि मरद के पंजा में कसमसाल जवानी भरल-पूरल छटपटाइत ... औरत के उहे मरद छोड़ सकऽ हे जे नामरद होतइ ! नञ छोड़लकइ !)    (आपीप॰84.12)
166    कसरइती (होवो दा नगर भोजे सही । मगर एक बात । हम अकेलुआ, से हो करता । हमर समय पिण्डे दै में बीत जइतो । तों कुल्ले नै एकरा में लगभो । अगर कसरइती कइल्हो तो ई काम नै सम्हड़तो ! तब समझो कुल गुड़ माटी । वंस के नाम कि होता आर जिनगी भर बदनामी के कलंक माथा पर । पैसा के कोय सवाल नै हइ । सवाल हइ एकरा सम्हाड़इ के ।)    (आपीप॰66.20)
167    कसरैती (तोरा टीवेल भिजुन खेत हइयै हो । ओजौका दू बीघा खेत टेबि को जेकरा जिमा नया माल हइ, ओकरा बटैया दे देहो । कड़ैती नञ, कसरैती नञ, कंजूसी नञ, हिसाब-किताब नञ । दुलार करहीं, पोछैत-पाछैत मुँह खाय, आँखि लजाय ! राजी हो जइतइ । जब तक नया हइ, रहतइ, पुरान होतइ, घर जायत । आर कि ?)    (आपीप॰104.16)
168    कहिया (= कब, किस दिन) (मइया कहलकइ - बेटा भगवान हथिन, अनियाय के सजाय ओकरा देथिन  देखहीं ने, उनका घर में देर हइ, अन्धेर नञ हइ ! ...  बेटा कहलकइ - कहिया ओकरा सजाय देथिन कि नञ देथिन ? तों देखवें कि नञ देखवें ? भगवानो अमीरे के पच्छ में रहऽ हथिन !; खेत में दू-चार गाछ रोपलकइ मुदा ओढ़निया हरदम सँसर जाय ! माथा पर से ओकरे सम्हाड़ै में पाँच गाछ के हरजा । मइया कहलकइ - मर्रर्र ! दुर्र हो !! दिन भर तों दोपट्टे सम्हाड़ै में रहमें तब रोपमें कहिया ? छउँड़ी ओढ़निया के मुरेठा बान्हि लेलकइ - देह के उभार !)    (आपीप॰28.24; 105.18)
169    कहौंका (= कहाँ का ?) (बप्पा अपन बलात्कारी बेटा के बोलैलक । अइलइ। पूछलकइ - तोरा पर ई सब आरोप हौ । कि सच हइ ? - नञ ! हम एकरा चिन्हबो नञ करऽ हियै ! कहौंका हिकइ । भले चाह दू चारि बेरी एकर दोकान पर पीलियै हे । दोकान पर तो संसार जा हइ ।)    (आपीप॰110.2)
170    काँचा (= कच्चा) (चलल जा हलइ । पंचू मिललइ । बुधना पुछलकइ - कि पंचू ? कैसन रहलइ ? खइला हा खूब ? पंचू कहलकइ - अच्छे हलइ नुनु । तनी बरहवा दिन अलुआ वाला तरकरिया लागइ काँचे रहि गेलइ हल । अऽ तेरहवा दिन दलिया शायत तनी लगि गेलइ हल, तनी जराइन लागइ ।)    (आपीप॰70.20)
171    काँटा-कुस्सा (उठ बन्दा, चल परसंडा, से चल देलूँ । जेठ के महीना । चलैत-चलैत दस एगारह बज गेल । टप-टप देह से घाम चूअऽ लगल, पियास से ठोर तिल-तिल सूखे लगल । एक पैड़िया रसता खेते-खेत कहैं आरी-अहरी काँटा-कुस्सा पार कइने-कइने पहुँचलों जहाँ देख के मन प्रसन्न हो गेल । जल भरल तालाब, तालाब पर घनगर पिपर के गाछ ।)    (आपीप॰7.2)
172    काट-वाछ (~ करना) (फेर ऊ धूप दियो लगला - ओंग माय काली नमो सोहा ! फेर पाँच बेरी धूप देके गोड़ लग के काली माय से कहलकन - आँय ! माय काली ! एत्ते तो खोंटा-पिपरी नियर धरती पर आदमी जनमि गेलइ ! एकरा काट-वाछ नञ करभो तब जुलुम हो जइतइ, माता ।)    (आपीप॰31.14)
173    काढ़ना (= निकालना) (सामान चढ़ गेल, कनियाय चढ़ली ! नाव धार पर सों-सों कइले, जैसे बालू पर गेहुँअन साँप चलल, झट सना गंगा पार कर देलक । कनियाय के करेजा धक्क कैलक एक बेरी ! जैसे कोय करेजा काढ़ लेलक ।)    (आपीप॰99.24)
174    कातिक (= कार्तिक) (कातिक में हरजोतवा अइतइ गँहूम बुन के, गोड़ में बियाय फाटल रहतइ । रात के मागु जौरे सुततइ । गोड़ा पर गोड़ा चढ़ैतइ । जों कहैं पियार से गोड़ा रगड़ देतै एकरा दन दोको लहू बह जइतइ । सबेरे इलाज करावो । हाथ बाँहि पकड़तइ ! जजै तजै छिला जइतइ, नछुड़ा जइतइ ! मर्रर्र दुर्र हो ! कते खोलि को कहियौ ! कुछ बुझवै नञ करऽ हइ । तनी अपना मन में लाजो नञ लागऽ हइ मर्दबा के गे माँय !)    (आपीप॰90.3)
175    कानना (= कनना, काँदना, क्रन्दन करना; रोना) (बिना बिना के ~; अमोढकार ~ ) (अनिल बाबू यहाँ जल्दी जो, नञ तऽ ई हाथ से निकल गेलौ । उ डाकदर नञ देवता हथिन । गरीब ले तो भगवाने बुझो । नामी-गिरामी बढ़िया डाकदर के सुभावो बढ़िया होवऽ हइ । दिल्ली-पटना से लौटल रोगी यहाँ कानइत आयल, हँसइत गेल । जिछना अनिल बाबू के यहाँ पहुँच के बुम्म फाड़ के कानऽ लगल, ऐसन रोवाय छूटल कि अनिल बाबू तो अनिल बाबू हथ ! आग भी ठंढा जाय ।; हिनकर औकात के लायक पट गेलन ! आको अपन मागु के सारे नोसो से कह सुनैलका ! मागु बिगड़ गेलन । गरजबे नञ कैलन, बरस गेलन ! मर्रर्र दुर्र हो ! एकर मती मारल गेलइ ! जब इहे करै के हलौ तब ओकरा पटना में काहे ले पढ़ैल्हीं ? रहो देथीं हल मुरूख ! माथा ठोक लेलकन ! बिना बिना के कानो लगलन । अमोढकार ।)    (आपीप॰4.5, 6; 89.8)
176    कानना-खीजना (ई तरे तर कानला-खीजला से अच्छा कुछ कैल जाय । कि कैल जाय ? अगर हम अप्पन माय-बाप के कहऽ ही तब पहिली साँझ चाँप चढ़ा के मार देत । सकरी नदी के तेज धार में भँसा देत । बाद कि होतइ हमरा पता नञ । मरलो पर लोग गारी से थुर्री-थुर्री कर देत । एकरा से अच्छा जेकर हिकइ सेकरे कहल जाय ।; भोला सुनलक - सिधेसर मिनिस्टर हो गेला ! मारे खुशी के पाँचो नाँच उठल । जेल में मिठाय बाँटलक । बकि जेल से छुटइ के कोय उपाय नै ! एकरा बहुत उमेद हल ! बकि मिनिस्टर साहब ! घुरि को देखइ ले भी नै ऐलखिन । केस एकरा तरफ से देखइ वाला कोय नै, आखिर कानैत-खीजैत तीन बरीस जेल में रह गेल !)    (आपीप॰12.21; 64.3)
177    कान्हा (= कन्हा; कन्धा) (सूपन हामी भरैत कहलखिन - दोसर बात ई कि अब कोय एक डेग पैदल चलइ ले नञ चाहऽ हइ । तहियौका लोग मुरदा कान्हा पर ढोने दस-दस कोस, बीस-बीस कोस से गंगा घाट लावऽ हलइ ! से अब देखऽ हहीं, मुरदा गाड़ी पर ढोवावो लगलइ ! सड़क से कत्ते दूर पड़ि जा हइ । करीब तीन कोस ! के पैदल आवऽ हइ ? अब तहियौका लोग नियर नया लोग के समांग भी नञ रहलइ ! जमाना के साथ सब कुछ बदल गेलइ हो । खान-पान, रहन-सहन, चालि-चलन, हवा-पानी, रोशनी सब डिसको हो गेलइ ।)    (आपीप॰32.8)
178    कार (= काला) (असमिरती फेर ओकर जमानत के संबंध में पूछलकइ । उ कहलक - देख रहल्हीं हें । अभी तक हमरा घर से या कहैं से कोय कार कौआ भी नञ मिलै ले आयल हे । पहिला आदमी तोहीं हें ।; अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ ।)    (आपीप॰48.18; 89.12)
179    काल्हु (= कल) (धन्नू चा के मन तो बिगड़लै, मुदा गम भीतर पचा गेलखिन । दरखास जेबी में चपोत के धइने घर आ गेला । बिहान महेश के सारी नो सो से कहि सुनैलखिन । महेश कहलकन - चलिहा, काल्हु छुट्टी हइ, चलवो । सबेरे तैयार होको दुइओ गेला आपिस । महेश जइते सलाम ठोकलकइ - परनाम इनरदेव बाबू । काल्हु हिनखरा काहे घुरा देलहुन । ला दरखास । काम करि दहो । तों तो सब तरह के भार भुँजइ वाला आदमी हा, तब ? तोर तो सगरे बड़ाय होवे हे, सेहे कुरोधि गेल्हो ।)    (आपीप॰116.24; 117.1)
180    काहे (= क्यों, किसलिए) (इलाज शुरूह भेल । उहे लाल-पीयर गोली, उहे पानी रंग-बिरंगा । सरकारी दवाय के कहना की ? सही रहे तऽ लोग प्रायविट में काहे देखावे ।)    (आपीप॰3.12)
181    किकियाहट (हूर ले पाहुर आ गेल ! ओकर चारो गोड़ मजबूत रस्सी से कसि को बान्हि देलकइ । ओकरा में एक से दू गो नौजवान पैना पेस के उठा लै, आर हूर ... ले हूर ... कह के भैंसिया के सिंघिया भिजुन दै। कोय-कोय भैंस तो पाहुर के किकियाहट सुन के लेह कबड्डी भागइ । कोय भैंस एकाह चौतर मारइ, पाहुर कें कें करइ !)    (आपीप॰75.12)
182    किछार (= किछाड़, किछाड़ा, किछारा; नदी या पोखरे का किनारा, तट, कछार) (तीनों गंगा के किछार में पीपर छाहुर तर बैठ गेला ।; एक बेरी माघी पुनियाँ में गंगा नहाय ले गेलइ । भला गंगा किछार में मुलुक मुलुक के लोग, किसिम किसिम के आदमी ! किनारा के बालू पर अखाड़ा बदि देलकइ । एगो कारे सन पहाड़ नियर जुआन लंगौटा हाथ में लेके सबके हँका देलकइ । कोय लड़इ वला नञ ?)    (आपीप॰33.12; 75.10)
183    किदो (= की तो, कादो; कातो) (करेजा थाम्ह के सुनहा, बात बढ़िया नञ हो ! पुष्पी के गोड़ भारी हो ! - आँय ! पुष्पी के ? कइसे ? कहाँ से ? - कहलियो ने ! ऊ जग्गा देखइ ले नञ गेलइ हल ? मोहना जौरे, ओकरे में रात हो गेलइ । कने कने ऊ, किदो रेस हाऊस होवऽ हइ ! ओकरे में सुतैलकइ आर बलात्कार कर लेलक ।)    (आपीप॰18.10)
184    किरिया (= कसम) (~ खिलाना) (ई पाँचो के ले जा के शिवाला में भोला के माथा पर हाथ धर के किरिया खिलइलका, हम तोरा पाँचो के नौकरी लगा को रहवो, चाहे आर केकरे लागइ कि नै ।)    (आपीप॰62.22)
185    किलियर (= clear) (बिना ओकरा तोड़ने जीत असम्भव ! किलियर फोटू हो कि ज्ञानदा बाबू जीत जयथुन ! से दिन से ओकरा न रात के नींद, न दिन के चैन मिलो लगलइ ।; पैसा के कोय सवाल नै हइ । सवाल हइ एकरा सम्हाड़इ के । अब तों कुले सोचो कि करवा ? हमरा तरफ से किलियर लैन हो । तोरा हाथ में वेवस्था दै हियो कइसे करवा, से तों जानो ! जे में ई नगर भोज हँसी होको नै रहि जाय !)    (आपीप॰62.18; 66.23)
186    की (= क्या ?) (पाठक के बात छोड़ दा तऽ हमरा खुद अचरज भेल: दरोगइ करइ वाला कठोर करमी, अन्दर से एतना कोमल ! साहित परेमी ! भला, एकरा से बड़गर अचरज की हो सके है ?)    (आपीप॰III.10)
187    की जन (= की जनी; क्या जाने, न जाने) (जिछना पहिले ऐसन नञ हलइ, की जन दस दिन में एकरा की हो गेलइ है ?)    (आपीप॰1.6)
188    कीनना (= खरीदना) (ओकर बाल छुअइत कहलखिन - देखहीं तो, एतना सुन्नर बाल, से लटियाल ! साबुन से काहे नञ साफ कर दै हहीं ? - हों करबइ । सबुने खतम हो गेलइ । आसकत ! कीनबइ ! ई एक हरयरकी नोट चमचम नमरी ओकरा हाँथ में दैत कहलखिन - ले । एकरे से जे तोरा मन होतौ खरीद लिहें । साबुन-सर्फ, आवडर-पावडर । सोचिहें नै । फेर माँगवौ नञ ।)    (आपीप॰106.22)
189    कीर (= किरिया, कसम) (मइया बोलैलकइ - पुष्पी ? आवें तो, देखहीं मथवा में कि तो काटऽ हइ ! - ढील्ला होतौ आर की ? -आवें ने, हेर दहीं । पुष्पी मइया के पीठ दने बैठ के ढील्ला हेरो लगलइ । मइया पूछलकइ - हौले-हौले ! बेटी ! साँच बोलिहें ! तोरा हमरे कीर, कमरिया चिक्कन लागऽ हौ, आव कै भी भेलौ । कहैं गोड़ घसकइल्हीं कि गे !)    (आपीप॰16.17)
190    कुच्चा (आलू के ~) (फुलवा के सबेरे रोटी आव आलू के कुच्चा खिला के सुता देलक हल ! मुदा फुलवा के आँखि में नीन कहाँ ? भूँजल मछली के गंध जो नीन आवो दिये ?)    (आपीप॰2.10)
191    कुमारि-वारि (बियाहल रहते हल तब सोचतिये हल कि बेटी के मारी अऽ बेटा के बचावी । कुमारि-वारि हइ, बेटा रहइ कि बेटी, खलास कर दहो, डाकदरनी साहब !; अच्छा बेटा ! हम एकर जवाब देवौ कि तोर आल-औलाद याद रखतौ । मइया कहलकइ - इ सब बोल के हल्ला कर दे । कुमारि-वारि हइ । घाटा केकरा होतइ ? से कि समझऽ हीं मइया । हम एत्ते बुड़बक नञ हियौ । हमरा बहिन के साथ अकेले में बलात्कार कइलकइ । ओकरा बहिन के साथ पन्द्रह गो से नञ करवइलों तब असली मनोज नञ ।; वहाँ हाथ लगा देलखिन जहाँ नञ लगावइ के चाही ... ऊ कानो लगलइ ! खोपड़ा से बाहर आ गेलइ । कानले घर गेलइ ! ... ऊ मैया के जाको सब कहलकइ ! मैया लोर पोछैत करेजा से सटा लेलकइ - दुर ने जाय छुछुनर ! एतना गो तो ओकरा खुद के जनमल बेटी रहते हल । अब तों खेत नञ अगोरइ ने जइहें । हम हीं जइबइ । ई बात आर कहैं नञ बोलिहें, कुमारि-वारि हें ।)    (आपीप॰19.3; 20.22; 107.19)
192    कुमेहर (मशानी बाबा ! मुरदा भेजो । ई तरह से सुक्खा रखभो तब हमर कि होतइ ? पाँच गो परानी मरिये ने जइवइ ? अऽ मुरदा कोय टुटी-फासटिक वाला नञ भेजिहो । भेजहो धन बुबुक वाला, जे माल-पत्तर दै । हम्मर रोजी-रोजगार चलइ । तीन दिन से बाबा एक मुरदा नञ अइलो ह । ऐसन कुमेहर तों हो जइभो तब हम्मर कि होतइ ?)    (आपीप॰31.8)
193    कुरधना (= क्रुद्ध होना, गुस्सा करना) (बराहमन के पाँचो टुक पोसाक हे, बकि माथा जे समूचे शरीर में सरेठ, सेकरा में टोपी नै । बरहमन के माथा उघारे, तब सब बेकार । ... हम कि कुरधल हियो थोड़े ? तोर वेवस्था पर हमरा मलाल होवे हे ।)    (आपीप॰70.1)
194    कुरोधना (तब एक आदमी अइलइ । परनाम इनरदेव बाबू कहि के कुरसिया पर बैठि गेलइ, अऽ कहलकइ - हमर वाला निकाल्हो । किरनियाँ सात दरखास के नीचे से निकाल के सब काम करके दे देलकइ । हिनकर मन कुरोधि गेल । सोचलका ऐसन काहे ? तब तक दोसर अइलइ । उहो काम करा के झट चल गेल ! इ बुझलका ओह ! जेकर पैसवा देल हइ सेकर झट सियाँ निकालि को दे दऽ हइ । आर कुछ बात नञ ।; चाचा बैठला कुछ देर । देखइ होथि - उहे सब दरखास तो हिकइ ! ई भीतरे भीतर कुरोधि गेलखिन । कहलखिन - अहो बोलो ने, कत्ते घूस लेवा ? कुल के करब करऽ हो अऽ हमरा ठकब करै हा ।)    (आपीप॰116.6, 15)
195    कुह-कुह (हम बियाहवइ कुर्सी पर बैठइ वाला के । हमरा आँखि में पाँखि एक्के गो माया बेटी ! सेकरा करवइ हरजोतवा से ? किरानी बाबू कहलखिन - एकरा कुछ के कमी नञ हइ । धन आरे-दुरे । औकात मुताबिक इहे ठीक हइ । कुरसी पर बैठइ वाला सिरिफ फरस बुकनी छोड़इ वाला होतौ । लसर मेरहा ! देखइ में चिक्कन जेकर जूरा करे महँ महँ, पेट करे कुह कुह ! बेटिया जिनगी भर कानते रहतौ । कुरसी पर बैठइ वाला तो हमहूँ ने हिकियै ! तऽ कि हइ । सोचहीं ने ।)    (आपीप॰89.20)
196    केकरा (= किसे, किसको) (ई बात कही केकरा ? मन के मीत भिजुन जब मन के बात खोलल जा हइ, तब दुख कुछ हल्का हो हइ । ओकरा सिवाय कोय ऐसन मीत नञ हलन जेकरा भिजुन खुलि को रो सकऽ हथ !; महेश बहुत देरी बाद अप्पन काम निवटा के अइलन । पूछलकन - देल्हो दरखास ? - हों हों । - केकरा ?  तरजनी अँगुरी से बता के कहलखिन - वह जे अपिसवा के दुअरिया पर खड़ा हइ । - आय महाराय ! ऊ तो चपरासी हिकइ ।)    (आपीप॰103.8; 114.17)
197    केरौनी (टमाटर रोपा हो गेल । केरौनी चलो लगल । ओकर मइया कहलकन - मनोज बाबू ! एजो एगो मचान गड़ि दहो । बाँग-बारी चीज बिना अगोरने ? के जाने, कखने कने से कि चल आवे । हम दिन भर माटी में रेटऽ ही । ओकरा कि लगतइ । एक छन में सब कैल-धैल चौपठ ।)    (आपीप॰105.23)
198    केहुनाठी (जाड़ा के दिन । साँझ के समय । धन्नू चा चुल्हा तर बैठि को पपुआ माय से कुछ के कुछ कहैत, रहस मारैत, कहलखिन - से कि समझऽ हीं पपुआ माय ? हमरा मामूली आदमी ! हम बाहर खिड़ँयजा नञ हियौ से से, नञ तो हम देखा दियौ अप्पन करामत ! हम केकरा से कमि को हिये तोरा लखे जे हो जाय ! पपुआ माय केहुनाठी से धक्का दैत कहलकन - हटो जी ! आँचो लगावो देवा कि नञ ? चाचा तनी सा हँट गेलखिन ।)    (आपीप॰112.5)
199    को (= कै; कितना) (बेटिया कहलकइ मैया से - अब कि करभीं मइया ? कुछ तो सोचहीं । मैया कहलकइ - कि करियै ? जे तोंहीं कहीं । - जो ने, मनोज के कह के कुछ माँग लावें । खाय पीयइ ले । चूल्हा-चक्की जोरें । ऐइसे को दिन काम चलतइ ?)    (आपीप॰111.1)
200    कोट (= कोर्ट) (इ बदचलन लड़की जाने कहाँ-कहाँ से बच्चा पैदा कर लेलक । ओकर गोदी के बच्चा केकर हइ उहे जाने । सेहे सती हमरा कोट से गुजारिश हइ कि कोट हम बेकसूर के साथ न्याय करे ।; नवीन के जेल से छोड़ावई में बड़ी मेहनत कैलक, अप्पन पति समझ के । नै तऽ उ जेल में सड़ते रहत हल अभी तक । सेहे सती हमर कोट से परारथना हइ कि नवीन आर असमिरती के पति-पत्नी रूप में नया जीवन शुरूह करे के आदेश देल जाय ।; दोनो के बयान सुनला के बाद कोट नवीन के तलाक के आदेश दे देलक ।)    (आपीप॰53.8, 16, 22)
201    कोट-कचहरी (= कोर्ट-कचहरी) (इ कोट-कचहरी पुलिस वेवस्था । सब पैसा पर बिकल हइ । इ पुलिस वाला के बारे में सुप्रीम कोट के जज के कमेंट हइ कि पुलिस वरदीधारी, सरकारी लाइसेंसी गुण्डा हइ । तोरा केस हारइये के चाही । अच्छा भेलो तों हार गेला । जीत के भी कुछ नञ होतो हल ।)    (आपीप॰24.23)
202    कोढ़ी (= कोढ़) (~ फूटना) (मने मन मोहना के हजार गारी दै, जो रे ! छउँड़ा, तोरा कोढ़ी फुटिहौ ! हमर जिनगी के नरक बना देलें । जो रे भँगलाहा ! तोरा देवी माय के खोंइछा में दे दी !)    (आपीप॰12.18)
203    कोतरी (आदमी कइसहूँ कइसहूँ रिलिफ वाला गहूम मिलो, दान वाला खिचड़ी, कोतरी मछली के पका-पका खा के जान पाल रहल हे ।)    (आपीप॰1.22)
204    कोरसिस (= कोशिश) (ई विरह गीत ऊ काहे गावऽ हलइ ? सचमुच ओकरा जीवन में कोय विरह वेदना घर कइले हलइ ? ऐसन कुछ बात नञ । उ तो जब मौज में आवइ तभी ई गीत गावऽ हल । ओकरा दोसर गीत नञ आवऽ हलइ, या आद नञ हलइ ! सीखइ के कोरसिस भी नञ कैलक हल ।)    (आपीप॰73.13)
205    कोहड़ा (हम लाख कहलियै छोटकी से, घीढारी नञ कराव । मुदा बूढ़ा-बूढ़ी के बात अब के माने हे ? ... बुढ़िया एक सुरर्रे बोलैत रहि गेलइ । घीढारी जे करे सेकरा साल भर नदी नञ नाँघइ के चाही, बरी नञ पारइ के चाही, कोहड़ा लगावइ के या खाय के नञ चाही, सराध के अन्न नञ खाय के चाही !)    (आपीप॰98.5)
206    कोहबर (पपुआ माय, तों तकदीर के सिकन्नर ! गाँग पैसि के वरदान माँगलें हल, जे तोरा हमरा नियर साँय मिललौ ! ऐसन साँय कुल के मिलतइ ? पपुआ माय तिरछी नजर से धन्नू चा के देखैत मुसकावैत मूड़ी नचा के कहलकइ - तऽब ! हमर बाप पाँच बरीस बरतुहारी कैलका । घर मिलल तब वर नञ, वर तब घर पसीन नञ ! दुओ आँख के सूरदास ! चौपठ ! यह मुरूख दमाद कोहबर में गोड़ लगैलका पहलमान जी ! कैसन पहलवान होथि, से हम जानऽ ही । बेटी भोगऽ हियन । ढेर बुधगर रहे से तीन ठमा माँखे ।)    (आपीप॰113.14)
207    कौड़ी-चूस्स (पचमा कहलकइ - अहो ! परानी परानी के अंसा होवऽ हइ । एकर मैया आदमी हलइ ? भगवान हो ! मँहा करमकीट ... । कौड़ी चूस्स ... भारी चिपास ... अपने कहियो भर पेट खैइले होतइ, जे भोज नीक होते हल ?)    (आपीप॰71.20)
208    खक्खड़ ((कुस्ती अऽ औरत दुन्नु में भारी बैर । औरत के बल आँखि में, नजर बातर हो हइ ! औरत के नजर से बेटा के बचइ के चाही । नञ तऽ औरत नजर के मन्तर से सब बल घीचि लेतौ । खक्खड़ बना देतौ ।)    (आपीप॰77.20)
209    खड़-खड़ौआ (~ रुपइया) (अचके जिछना के आँख चमक गेल । ओकरा याद आयल, वहाँ अस्पताल में खून खरीदल जा हइ । डूबइत के तिनका ... इहे उमक पर चल देलक पटना । जिछना सबसे पहले अस्पताल पहुँचल जजा खून खरीदल जा हल । खून बेच के खड़-खड़ौआ पाँच सौ रुपइया नगदी फाँड़ा में खोंस एन्ने-ओन्ने देखले दवाय के दोकान पर जा रहल हल ।)    (आपीप॰4.24)
210    खदी-बदी (= अपराध, कसूर; दोष, त्रुटि; कारण) (बिना ~ के = अकारण) (भोला कहलकइ - से तो हइ, मुदा जुल्मी के मार के जइतों हल, तब कोय हिरोही नै ! ई बेकसूर के, बिना खदी-बदी के अप्पन गोतिया भाय के मार के जेल गेलों, इहे अपसोच हमरा तिल-तिल खा रहल हे । अपना पेट खातिर ई काम कइलों ! सेहो नै भेल, उलटे बाप-दादा के जे दू बीघा हल सेहो बिक गेल ।)    (आपीप॰64.16)
211    खधोड़ी (= खधोड़ स्त्री) (इसकुल अच्छा चलऽ हलइ । बहुत लड़की रहऽ हलइ, सब अप्पन-अप्पन घर चल गेलइ । नेतवे एकरा बरबाद करि देलकइ । ई तीनो गो रहि गेलइ । ई तीनो खतम हइ ! ओकरा में सबसे तनी नीक सभ्यते हइ । संसकिरतिया तो भारी भ्रस्ट हइ खधोड़ी । ओकरा रात-दिन उहे चाही । राजनीतिया किरीमनल हइ ।  एक से एक नेता, इनिस्टर-मिनिस्टर एकरा भिजुन आवऽ हइ ।)    (आपीप॰11.1)
212    खनदान (= खानदान) (जे बड़ाय करें तो ऐसन । यहाँ तोर बाप, हमरा बाप के गोड़ पर जनौआ धर के कहलखुन । अब जनौआ के लाज तोहरे जिमा । तब जाको कहैं हमरे तोरे जूड़ा बन्हन भेल । लछमी अइली हमरा घर । तोरा अर छोटहा खनदान मानऽ हलखिन हमर बाप !)    (आपीप॰113.19)
213    खपरी (= खपड़ी) (दू गुड़िया हाथ में देइत कहलकइ - ले बेटा, एतना से की होतइ ? ... फुलवा सवाद-सवाद के खइलक आव हलस के सुत गेल । बिहान फेर बोखार । जिछना पूछलकइ - खइम्हीं फूलो ? फुलवा लाल-लाल आँखि से ताक के गुम हो गेल । हाथ छू के बेटा के जिछना देखे हे तऽ ओकर होसे उड़ गेल । देह तवल खपरी लगे । कहलकइ डगदरवा पूछतौ तब ई नञ कहिहें कि मछली खइलों हें ।)    (आपीप॰3.3)
214    खराद (= लकड़ी या धातु को चिकना करने का औजार; लकड़ी या धातु को चिकना करने की क्रिया) (मंत्री जी कहलखिन - ई अच्छा नञ कइल्हो ! सी॰बी॰आइ॰ जाँच लौटा लहो, मिलाजुला के चलाभो ! कुछ अपनो खाहो, दोसरो के खिलाभो ! नियाय के ई तरह से खराद पर चढ़इभो, तऽ अनियाय हो जइतइ !)    (आपीप॰41.3)
215    खर्रहना (एक दिन जिछना के जाल में संजोग से रेहू मछली पकड़ा गेलइ । ओकरा तो तेल में चुपड़ के खूब खर्रह के भूँजलक ।)    (आपीप॰2.10)
216    खलास (~ करना, ~ कराना) (मइया एक छन तो सुन के सन्न रह गेलइ ! मोहना ... भीतर घुइया ... ! हम ऐसन जानतिये हल तब जाय नै देतियौ हल ! हम तो अच्छा आदमी समझऽ हलियै । सेकर ई काम ! भाइयो-बहिन नञ चिन्हे ! ई जुग में केकरा पर विसवास ! ठीक हइ, कल्ह चलें डाकदरनी यहाँ खलास करा दियौ !; बियाहल रहते हल तब सोचतिये हल कि बेटी के मारी अऽ बेटा के बचावी । कुमारि-वारि हइ, बेटा रहइ कि बेटी, खलास कर दहो, डाकदरनी साहब !)    (आपीप॰17.17; 19.3)
217    खस-खेलनी (मुरदा ठीक सामने आके किनारा लग गेलइ ! मौगी अऽ बेटवा जाके देखलकइ । चिकुलिया बोललइ - देखहो ने जी ! अपसूइये हइ, कत्ते सुन्नर हइ ! सुपन जाके देख के हामी भरलका ! हों हों । चिकुलिया कहलकइ - लगऽ हइ माइयो निकसी हलइ ! खस खेलनी ! नान्हें वैस में एकरा पित्त में कत्ते गरमी हलइ ? कोय अपने परिवार चाँप चढ़ा के मार देलकइ हे ! घेंचिया में रस्सी के दाग हइ !)    (आपीप॰33.7)
218    खाँव-खाँव (ई कहलखिन - मीयाँ तो इमानदार होवऽ हइ महेश । कि उहो एइसैं करतइ ? - दुर महराय ! अब धरती पर कोय असली हिन्दू कि मीयाँ रहलइ । हे द्रव तों सरबगुण काल्हु देखिये लेभो ! पैसवा ले कैसे खाँव-खाँव करऽ हइ, जबकि हाजी हिकइ, हज करि को अइलइ हे । हाँथ से घूँस के रूपइया नञ छूतो ! कहतो टेबुलवा के दरजवा में गिरा दै ले । देखिहो ने !)    (आपीप॰117.19)
219    खिँड़ना (= फैलना) (पाँच मिनट में ऊ पहाड़ सन जन के चित कर देलकइ, उपरे से फेंक देलकइ ! ऐसन धोबिया पाट मारलकइ कि खड़े चित्त ! चित्त करइ में कोय परिसरम नञ ! फेर तो उ गाँव वाला के रोस आ गेलइ ! दोसर तैयार भेलइ ! ओकरो फुरती से खड़े चित्त । फेर तो इलाका बाद हो गेलइ ! बकि, ई सहजोर ! एक लंगौटा पर पाँच कुश्ती मारलकइ ! सब पूछइ - इ कहाँ के जुआन हइ ? कि नाम हिकइ ? फेर तो एकर नाम इलाका में खिँड़ गेलइ ! जहाँ-जहाँ दंगल होय, एकरा बोलावो लगलइ । जिला जवार में नामी पहलमान हो गेलइ !)    (आपीप॰76.21)
220    खिखनी (दुबरा के ~ होना) (जिछना पहिले ऐसन नञ हलइ, की जन दस दिन में एकरा की हो गेलइ है ? अब तो दुबरा के खिखनी हो गेलइ, नञ तऽ एकर देह ... ? देखइत बनऽ हलइ । सोंटल सिलोर, जुआन जइसे कोय ताड़ के जड़कुन सिल्ली होय ।)    (आपीप॰1.7)
221    खिड़ँयजा (जाड़ा के दिन । साँझ के समय । धन्नू चा चुल्हा तर बैठि को पपुआ माय से कुछ के कुछ कहैत, रहस मारैत, कहलखिन - से कि समझऽ हीं पपुआ माय ? हमरा मामूली आदमी ! हम बाहर खिड़ँयजा नञ हियौ से से, नञ तो हम देखा दियौ अप्पन करामत ! हम केकरा से कमि को हिये तोरा लखे जे हो जाय ! पपुआ माय केहुनाठी से धक्का दैत कहलकन - हटो जी ! आँचो लगावो देवा कि नञ ? चाचा तनी सा हँट गेलखिन ।)    (आपीप॰112.2)
222    खिस्सा (= किस्सा) (मोहना हियावे हे तऽ देखे हे एगो लड़की चलल आ रहल हे धीरे-धीरे ! फेर ओकरा बूढ़-पुरैनिया के खिस्सा याद आ गेलइ ! मरद के जनानी भूत पकड़ऽ हइ जेकरा पर ऊ आशिक हो जा हइ !)    (आपीप॰83.22)
223    खुट्टा (दुइयो मगन साँझ पड़े घर आवे, भैंस गाय खुट्टा में बान्ह दिये ।)    (आपीप॰74.8)
224    खुरा डोभ (ऊ पूरा दरखास अऽ साथे साथ औडर सीट पढ़िको समझि गेलखिन । कहलखिन - आप तो महेश बाबू जानते हैं, कैसा अपीसर है यह ! पाँच हजार कर दिया है इधर से ! आप दे दीजिये, हम करवा देंगे । महेश एक बार सन्न हो गेलइ ! पाँच हजार ! तीन हजार तो ओकर रेट हलइ । बह बजार खुरा डोभ ! तऽ ?)    (आपीप॰119.10)
225    खेतारी (पाँच हजार घूस में बात भेलो ! बाबू के कहलियो ! ऊ सूद पर रूपइया लाको देलखिन ! हम दे अइलियै बहाल करइ वाला अपीसर के । ओकरो कइ एक साल हो गेलो ! जब जा हियो, हाँ हाँ ! अब हो जायगा । घुर आवऽ हियो । उहे रूपइया हमरा ले काल हो गेलो । बाबू कहऽ हथुन - ऊ रूपइया तों रंडी के दे अइलें । चानी के जूता केकरा नञ नमा दियै ! एक हाथ रूपइया दोसर हाथ काम । या तो तों नञ देल्हीं, या रूपइया खेतारी कइलें । आखिर एक दिन कुरोधि गेलखुन । कहलखुन - हमर रूपइया ला को दा, या दुओ जीव अलग खा । लटपट बतिया मोहि न सुहाय, टाट पलंग लेहो माथा चढ़ाय ।)    (आपीप॰96.14)
226    खोंइछा (हे माय ! भगवती ! तों सबके लाज रखइ वाली माता ! तोहरे खोंइछा में हियो, लजा बचावो ।)    (आपीप॰12.7)
227    खोंटा-पिपरी (~ नियर जनमना) (फेर ऊ धूप दियो लगला - ओंग माय काली नमो सोहा ! फेर पाँच बेरी धूप देके गोड़ लग के काली माय से कहलकन - आँय ! माय काली ! एत्ते तो खोंटा-पिपरी नियर धरती पर आदमी जनमि गेलइ ! एकरा काट-वाछ नञ करभो तब जुलुम हो जइतइ, माता ।)    (आपीप॰31.13)
228    खोपड़ा (ई ओकर ओझरल लट सुलझावो लगलखिन । ओकरा सायत अच्छा लगलइ । ई पीठ पोछो लगलखिन । ऊ मुसका देलकइ । हिनकर मन बढ़ गेलइ । वहाँ हाथ लगा देलखिन जहाँ नञ लगावइ के चाही ... ऊ कानो लगलइ ! खोपड़ा से बाहर आ गेलइ । कानले घर गेलइ !)    (आपीप॰107.14)
229    खोसबक्ती (= खोसरजाय; बख्शीश) (पूछलखिन - इनरदेव बाबू, हमर उपरे में हलइ, सेकरा सात तह नीचे करि देल्हो । आर ओकर वाला सात तह नीचे से निकाल के देलहो । पैसवे के चलते से ने ? बोलो ने, कि तोहर फीस हो ? हमहूँ दे देवो ! आर कि ? ऊ बड़ा परेम से कहलकन - पहलमान जी ! पैसा तो खोसबक्ती है ! ऊ दूसरा चीज था । आप नहीं समझेंगे । इतमिनान से बैठिये ।)    (आपीप॰116.12)
230    गँहूम (= गहूम, गोहूम, गोधूम, गेहूँ) (अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ । गँहूम फटकतइ । चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ !)    (आपीप॰89.12)
231    गछना (= स्वीकारना, मान लेना) (कि कैल जाय ? अगर हम अप्पन माय-बाप के कहऽ ही तब पहिली साँझ चाँप चढ़ा के मार देत । सकरी नदी के तेज धार में भँसा देत । बाद कि होतइ हमरा पता नञ । मरलो पर लोग गारी से थुर्री-थुर्री कर देत । एकरा से अच्छा जेकर हिकइ सेकरे कहल जाय । एइसौं गारी एइसो गारी ! गछ ले तों, ललचइलें से सदा-सदा के लिए तोर साथ हियो ।; गंगा के मने-मने परनाम कैलकी । गछलकी नीक्के-सुक्खे घुरवो माता तब दूध के ढार देवो, रच्छा करिहा ।)    (आपीप॰13.1; 100.3)
232    गड़ना (= चुभना, धँसना; गाड़ना) (ई अप्पन बिट्टा से बाँस काटि को खूब बढ़िया मचान गड़ि देलखिन - उपर से निच्चू पलानी भी । मचान के फराटी पर गद्देदार नेबारी के बिछौना । एकाएकी तीन में कोय ओजो रहो लगल । मनोज के छुट्टी मिले तऽ ओजइ गिरल रहथ ।)    (आपीप॰106.2)
233    गड़र-गड़र (~ आँख से हियाना) (कोय परवाह नञ बेटा ! तोरा ले हम परान देके कौआ के अमर बूटी ले अइलियो ... हहरिहें नञ । फुलवा गड़र-गड़र आँख से हियावैत रह गेल । दवाय के पुड़िया देखा के जिछना कहलक, देख तोरा ले पटना से दवाय ले अइलियौ ।)    (आपीप॰5.9)
234    गदका (मान ला पैसा होइयो जाय बकि नगर भोज मामूली चीज नै हइ, ओकरा सम्हाड़ना बड़ा कठिन काम ! कोय कहलक - अपने एसकरूआ । पिण्डे में लगल रहतइ । गोतिया ओकर कैसन हइ से केकरा नै मालूम हइ । बाबा भरोसे गदका !)    (आपीप॰67.8)
235    गदाल (= गुदाल, हल्ला) (हमरा साथ बदमाशी करो लगलइ । हम विरोध कैलियै कि हमरा मारो लगलइ । मन तो कैलकइ गदाल करी, मुदा आगू के सोचिको रूकि गेलियो । संसार की कहतइ ?; बूथ पर जाको वोट छापो लगलई - परजाइडिंग अपीसर से वोट वाला गड्डी छीन के ठप्पा मारऽ लगलई । तब तक गाँव में गदाल हो गेलइ । गनौरी चा के समरथक लाठी-पैना, भाला-बरछी से जुटलई ! एकरा जिमा में बन्धूक पिसतौल हलई ।)    (आपीप॰17.7; 63.14)
236    गनना (= गिनना) (धन्नू चा कुछ झेंपैत तनी चिढ़ावैत कहलखिन - सेह न कहऽ हियौ, तों तो जी से कुछ गनवे नञ करऽ हीं, तब कि । जे चरावे डिल्ली सेकरा तों चरावें घर के बिल्ली । - एह, तनी एक बाबू साहेब ई पटना डिल्ली में रहइ हथ जे जाने गीदर के नगड़ियो नञ, भाषण नम्भा-नम्भा !)    (आपीप॰112.19)
237    गनी-गरीब-अमीर (बेटा, ऐसन रंग चढ़ावो कि जुग-जुग नै मेटावे, ऐसन सुगंध बसावो कि पुश्त-दर-पुश्त दम दमावैत रहे । होवो दा मूँगवा लड्डू, घतींगवा भोज । दा एक दिन समूचा गाँव के चुल्हिया लेवार करि । गाँव भर के गनी-गरीब-अमीर सब के मुँह मीठा करि दा, जे सब मिल के परानी के असीरवाद दिये, स्वर्ग में परानी के सुख मिले ।)    (आपीप॰66.14)
238    गनौरा (गनौरी चा के नाम इलाका में के नञ जानऽ हइ । धन धरावे तीन नाम । पहिले लोग इनका गनौरा कहऽ हलन, बाद में कँगरेसी भेलखिन, तब गनौरी । अब के बात चलाय, हिनकर धोती अकाश में सूखे हे, जड़ पाताल में डोले हे । गनौरी से ज्ञानदा हो गेला ।)    (आपीप॰60.9)
239    गभरू (~ जुआन) (गाँव के गभरू जुआन सबेरे से भिड़ गेल काम में । सराध के फिरिस तैयार - पूरा विलखो सर्ग ।; लड़का मस्त मौला ! गभरू जुआन ! नम्मा-तगड़ा, सुन्नर पहलमान - दू मन्ना पट्टा हथलाल उठा लिये । मैटरिक पास ! अब कि चाही ? हिनकर औकात के लायक पट गेलन ! आको अपन मागु के सारे नोसो से कह सुनैलका !)    (आपीप॰67.21; 89.3)
240    गरंटी (= गारंटी) (चुनाव हम जीतवइ ! आव मिनिस्टर होवइ । गरंटी हइ । ... भोला कहलकइ - सब समझ गेलिऐ मंत्री जी । एतना बुद्धू नै हियै । मंत्री जी डाँट देलखिन - खूब समझैत रहो । ऐसन बुझक्कड़ रोज हमरा अथी में लटकल रहऽ हइ ।)    (आपीप॰65.11)
241    गरमजरूआ (तब कत्ते अच्छा हल । घर के आगे तालाब ! उत्तर गरमजरूआ रास्ता । पूरब भी पच्छिम भी । गैरमजरूआ खुला मैदान । अब सब पर ओकरे कब्जा हे ।)    (आपीप॰23.17)
242    गरहन (= ग्रहण) (बालाजीत के माय-बाप के धैल नाम बलराम हिकइ ! इसकूल में बालेश्वर । मुदा देहाती लोग विचित्र होवे हे ! ओकर अप्पन शब्द माधुर्य होवऽ हइ । बड़का नाम के ऊ बहुत छोट बना को गरहन करै हे । सेहे सती बालेश्वर के बाला कह के पुकारऽ लगल !)    (आपीप॰95.7)
243    गरि (= बोझ नहीं लेने वाला) (अरे जन्नी तो वाम बुद्धि ने होवऽ हइ । कहल गेलइ हे कि औरत के नाक नञ रहे तो मैला खाय ! अरे ! 'आदमी आनाड़ी अऽ गदहा गरि' इ कहैं सुनल्हीं हें ?)    (आपीप॰112.24)
244    गरियाना (= गारी देना) (तोरा बहिन के मोहना ... ! ई हिम्मत ... ! - बस हो ने गेलो ? एकरा में रोस के जरूरत नञ हइ । जे बवाल करभो तोरे घाटा होतो । अभी दू महीना बीत के तेसर चढ़लइ हे, फेर भारी हो जइतो, पैसो खरचा, संसार भर बवाल भी । - मोहना बाबा के नाम ले को गरियैलखिन - तोरी मन सोधरा बेटी के ... !)    (आपीप॰18.17)
245    गलन्त (चिकुलिया कहलकइ - ई धौतला के सिवाय कोय नञ लेलको ह जी । सूपन कहलकइ - से कइसे समझल्हीं ? ऊ लेके कि करतइ ? - ओकरे कामे हिकइ । हमर आतमा कहऽ हइ । ताजा लहास हइ, मुड़िया काट के बेच लेतइ । अच्छा दाम मिलतइ । विदेस भेजल जा हइ । नै जानऽ हो ? - चलो अब गलन्त के सोचन्त कि, लछमी जे धारलकी से बहुत देलकी ।)    (आपीप॰35.25)
246    गलबात (अब जिछना के मुँह में वकारे नञ ! धान दिये लावा होय लावा ... । ऊ फिहा-फिहा हो गेल । अँगना में देखइ वालन के मेला जुट गेल । जिछना के कपार में आग लग गेलइ । उतरा चौली के गलबात चलो लगलइ । जुआन बेटा चलल जा हइ । जान के जहर खाय, देव के दिये दोख ।; नरेश बाबू हुनकर मित्र में से हथिन । जिगरी दोस्त । हुनका एक दिन सारे नो सो से एगारह तक समझा देलखिन । खोल के अपन औकात बता देलखिन । नरेश बाबू सब सुन के कहलखिन - नौकरी वाला दुल्हा के गलबात छोड़ो !)    (आपीप॰3.21; 88.17)
247    गवाही (= गवाह)  (दुलो चा गरजि को बोलो लगलखिन - यह ! यह ! चूड़ा के गवाही दही ! हरिण के जामनी सूअर ! कवि के दोस्त हिकन जिगरी ! मिलावो लगला । खूब नोन-तेल लगावो लगला ! अभियों कि नञ हइ ओकरा ! चार बीघा जमीन हिस्सा ! अपने भी बी॰ए॰ पास, मागू भी पढ़ल ! गाँव भर के नुग्गा सीये ! दरजीनी बीबी ! अब कि चाही ?)    (आपीप॰94.21)
248    गहकी (= गाहक, गाँहक; ग्राहक) (ऊ बुढ़िया हिकइ दलाल, फुसलौनी माय, गहकी बझा को लावऽ हइ । उहे आमदनी से ई चलि रहलइ हे । आर कि कुछ रोजी-रोजगार हइ ? कि खेती ?)    (आपीप॰10.7)
249    गहूँम (= गोहूम, गोधूम, गेहूँ) (धन्नु चा जैसे चिढ़ावइ ले आझ बैठलखिन हल ! मुसुका को कहलखिन - पपुआ माय ! एकाह दिन जो बजार जा हियै - से मे तो बजार के कत्ते लोग जे नहियों चिन्हऽ हइ सेहो, परनाम पहलवान जी ! राम राम खलीफा जी ! अहो, हम मामूली हियै ? दशा-दिशा नर पूजिता ! पपुआ माय अधकट्टी चनरमा कट मुसुक्का मार के कहलकन - ऊ हूँ, तोरा ने ? तनी एक जमाहर लाल ई बाबू साहेब, से हिनखा कुले परनाम करऽ हन । देखियो तो कुले ला रहलऽ हे, सरकारी गहूँम, सरकारी रूपइया । तोरो से होतइ ?)    (आपीप॰112.17)
250    गहूम (= गोहूम, गोधूम, गेहूँ) (आदमी कइसहूँ कइसहूँ रिलिफ वाला गहूम मिलो, दान वाला खिचड़ी, कोतरी मछली के पका-पका खा के जान पाल रहल हे ।)    (आपीप॰1.22)
251    गाँग (= गंगा) (घीढारी जे करे सेकरा साल भर नदी नञ नाँघइ के चाही, बरी नञ पारइ के चाही, कोहड़ा लगावइ के या खाय के नञ चाही, सराध के अन्न नञ खाय के चाही ! एकर भाय के बियाह ठीक हो गेलइ हे । ई गांग पानी, नदी-नाला रहे तऽ कहल जाय ! ई गांग, बड़की गांग । ... बाप रे ! ओकरा नाँघि को ओय पार जाना ! जानि को जहर खाना !; ढेर करी अदना ले, थोड़ करी अपना ले । पपुआ माय, तों तकदीर के सिकन्नर ! गाँग पैसि के वरदान माँगलें हल, जे तोरा हमरा नियर साँय मिललौ ! ऐसन साँय कुल के मिलतइ ?)    (आपीप॰98.6, 7; 113.10)
252    गाँव-गिराँव (पूछलखिन - कि सूपन ? आर सब ठीक ने ? जी हाँ । गाँव-गिराँव ? सब ठीक । बाल-बच्चा ? ठीके हइ बाबू !)    (आपीप॰40.6)
253    गाटर (गेलइ सूपन के बोलावइ ले तऽ देखे हे पी पा के बराबर ! उठैलकइ - तब तक निशा के हलका सुरूर आ गेलइ हल ! उठ के गाना गावो लगलइ आर नाचो लगलइ - "लोहा के गाटर में सड़िया जे फँसलौ, लहँगा भेलौ उघार गे ! घड़-घड़ घड़-घड़ गाड़ी अइलौ, भेलौ पुल के पार गे !" एतना कह के मागु के अँचरा खींचो लगला ।)    (आपीप॰35.7)
254    गाड (= गार्ड) (गनौरी चा के समरथक लाठी-पैना, भाला-बरछी से जुटलई ! एकरा जिमा में बन्धूक पिसतौल हलई । सुरच्छा के नाम पर वहाँ होम गाड के दूगो लाठी पाटी, एगो चौकीदार ! ऊ सब तो बम के आवाजे से सलेन्डर हो गेलइ बेचारा ! बूथ छोड़ के भाग गेलइ ।)    (आपीप॰63.16)
255    गारा (= गला, गरदन ?) (सुखराती के बिहान हूर पड़तइ हल । साँझे सब किसान अपन बैल के सींग में तेल लगा लगा उरेह के नैका अपना हाथ से बनावल तरह तरह के फूल वाला फुदना सींग में पिन्हा रहल हे । गारा में नया रंग-बिरंगा जोठ पगहा । बैल के पूरा देह पर चिलिम के छाप, लाल-पीयर-हरियर तरह तरह के रंग में देखैत बने ।; भैंस के नेठो नियर घुरल सींघ के तो बाते छोड़ो ! दू दिन पहिले से किसान तेज छुरी से ओकर मरल चत्ता छिल के चमका दिये । बिहान दुहबिनी ओकरा में सिन्नुर तेल भोगार दिये ! ऐसन भोगारे कि कहल नञ जाय । गारा में पीतर के सिकड़ी, चमाचम पानी चढ़ायल सोना के मात करे ! गारा में जोठ, जोठ में घंटी, केकरे घंटिये नञ, घण्टा कहो, टनाक-टनाक बाजे ।)    (आपीप॰74.15, 24; 75.1)
256    गाह-बेगाह (सितिया अब जुआन हो चललइ हल ! शादी-बिहा भी हो गेलइ हल ! गाय चराबइ ले गाह-बेगाह जा हलइ ! काहे तऽ अब सरेख हो चललइ हल ! सरेखे नञ, जुआन ! पूरा भरबा भूत जुआन !)    (आपीप॰76.24)
257    गियारी (सब ठीक हो जइतौ ! मुदा दवाय के गोली भीतर जा नञ सकल ... । गियारी में टेंगरा सन अटक गेल । अचके फुलवा के आँख चमक के फैल गेल । इ देख के जिछना के अँखिये नञ देहियो पथला गेल ।)    (आपीप॰5.14)
258    गिरिल (= ग्रिल) (उठा को हाजी साहब के सरंग गोलो कुरसिया पर फेंकि देलखिन । मथवा फूटि गेलइ ! गोड़ा हाँथा में मोच आ गेलइ ! ई भागला गेटवे दने से दू सिपाही घेरलकइ डण्टा पाटी । एगो के उठा को मुड़िये भार बजाड़ि देलखिन । मुड़िया फूटि गेलइ । दोसर के ठेलि देलखिन । गेटवा के गिरिलवा के लोहवा से टकरा गेलइ । हाँथे टुटि गेलइ ।)    (आपीप॰121.8)
259    गुजुर-गुजुर (जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल । कौर चिबावइत फुलवा जिछना दने हियावे हे, तऽ देखे हे कि गुजुर-गुजुर दूगो आँख कटोरा दने ताक रहल हे । जब कौर उठावे तऽ ओकरा लगे कि हर कौर में फुलवा के आँख हे । नञ रहल गेलइ । आँख में पाँख ओकरा वंस में इहे, एकरा ले ऊ कि नञ कर सके हे ।)    (आपीप॰2.15)
260    गुड़ (बुधना अन्दर से खीझ गेल । बेकार ई फेरा में फँसलों । ई सब हिकइ आदमी वाला के जे पाँच गो हइ । हमरा नियर एसकरूआ के नै हिकइ । अब तो ई गुड़ खइनै कान बिहैनै । करमठ के काम खतम हो गेल । अब भोज के बारी हे ।)    (आपीप॰70.5)
261    गुड़िया (मछली के ~ = मछली का टुकड़ा) (फुलवा के सबेरे रोटी आव आलू के कुच्चा खिला के सुता देलक हल ! मुदा फुलवा के आँखि में नीन कहाँ ? भूँजल मछली के गंध जो नीन आवो दिये ? ... कनमटकी पारले रह गेल फुलवा । जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल ।)    (आपीप॰2.12)
262    गुन (= गुण) (जे किसान के भैंस बलगर अऽ गेरगर हलइ से लछरि-लछरि चौतार मारइ । ई साल के हूर वाला पाहुर के लेधड़ी, सौखवे के भैंस छिरियैलकइ । जे किसान के गाय चाहे भैंस पाहुर देखते भाग जाय, से किसान के मरग बुझो । ओकरा लगल जैसे माथा पर अस्सी चोट के बज्जड़ गिर गेलइ । जेकर भैंसि हूर ले लेलक, से भैंस गोरखिया के मन आसमान छू लिये, देह एक बित्ता उँच हो जाय ! उ जानवर के इलाका भर में गजट हो जाय, बिके तऽ दू पैसा जादे दाम में, सिरिफ इहे गुन के चलते ।)    (आपीप॰75.22)
263    गुमसायन (~ महकना) (हमरा आँखि में पाँखि एक्के गो माया बेटी ! सेकरा करवइ हरजोतवा से ? ... कुछ रहे कि नञ, हमर परतर करतइ हरजोतवा ? साँझ अइतइ भादो में खेत से रोपा करा को, गोड़ में कादो लगल रहतइ ! दिन भर रौदा के झमायल ! गोड़ धोतइ । राति सुततइ मागु जौरे ! गुमसायन महकतइ ! ओकर देह में सट के हमर बेटिया के नीन होतइ ?)    (आपीप॰89.23)
264    गे (ऊ उठल, सुतली रात में सान्ही-कोना खोजो लगल । खुर-खुर के आवाज सुन के भइया जागलइ । पूछलकइ - की करऽ हीं गे ? मइया देखहीं ने, कनबलिया वाला डिब्बा जजो धैलियै हल ओजो नञ हइ ।; ऊ रात अदरा के खीर-पूड़ी बनलइ हल, आँठे-आँठ खा लेलकइ हल ! इ अलाय-बलाय चीज पेट में जाते मातर फेंक देलकइ । फेर कुल्ला कलाला करके सुतलइ ! फेर दुबारे कै । दोसर बेरी में मइया जागलइ । पूछलकइ - कि भेलौ गे ? कुछो ने मइया । नञ पचलइ । बिगि देलकइ ।; मने मन भगवान के हजार गारी देलकइ । ई भंगलाहा भगवान हिकइ ! बेकार एकरा पर भरोसा कइलूँ । मइया पूछलकइ - कैसन मन हौ गे ? अच्छे हइ मइया ।; बेटी ! साँच बोलिहें ! तोरा हमरे कीर, कमरिया चिक्कन लागऽ हौ, आव कै भी भेलौ । कहैं गोड़ घसकइल्हीं कि गे !)    (आपीप॰15.14, 24; 16.6, 18)
265    गे (माया हर बार गर्मी छुट्टी में गाँव आवऽ हल, मुदा ई बार जे घर आल ह सेकरा में कुछ विशेष बात हइ । हर बार अकेले आवऽ हल, ई बार लड़का साथी साथ अइलै हे यहाँ तक पहुँचावइ ले । मैया ! देखते माँतर छनक गेलइ ! ओकरा मन में डौट गेलइ ! कहौं अँचरा में तो दाग नञ लगैलकइ रे बाप ! एकन्त में बेटिया से पूछलकइ - ई के हिकइ गे ?)    (आपीप॰86.5)
266    गेनरा (अनरूध समझैलकन - मनोज धीरज धर ! कछौटा बान्ह ! तोरा राम-लछुमन दू बेटा । संसार कि कहतौ ? बियाह करभो बुढ़ारी में ! नतीजा ! कहावत में हइ - रात के तेल लगावी गेनरा ले, बुढ़ापा के बियाह दोसरा ले । अऽ बेटवा हो जइतो दुसमन !)    (आपीप॰103.24)
267    गेन्हारी (गरमी दिन में खेत जइतन । ओने से लेने अइतन दौरी भरल कदुआ, ककड़ी, लालमी, खीरा, बतिया, रामतोड़इ, तारबूज, खरबूज, पोदीना के पत्ता ! पेट के ठीक करे, गैस नकाले ! गेन्हारी साग !)    (आपीप॰91.15)
268    गेरगर (जे किसान के भैंस बलगर अऽ गेरगर हलइ से लछरि-लछरि चौतार मारइ । ई साल के हूर वाला पाहुर के लेधड़ी, सौखवे के भैंस छिरियैलकइ ।)    (आपीप॰75.16)
269    गेस्टिंग (= गैस्ट्रिक; पेट सम्बन्धी समस्या) (बेटी-दमाद के हो जैतन गेसटिंग । डाकदर कहतन चना के सत्तू खाव । बेटी लैतौ बाजार से दू सौ गिराम पचास रूपये कि॰ । सेहो सही नञ । ओकरा में खेसाड़ी मिलल ! गेस्टिक के गेस्टिंग बढ़ले जैतन ।)    (आपीप॰92.8, 10)
270    गेस्टिक (= गेस्टिंग; गैस्ट्रिक; पेट सम्बन्धी समस्या) (बेटी-दमाद के हो जैतन गेसटिंग । डाकदर कहतन चना के सत्तू खाव । बेटी लैतौ बाजार से दू सौ गिराम पचास रूपये कि॰ । सेहो सही नञ । ओकरा में खेसाड़ी मिलल ! गेस्टिक के गेस्टिंग बढ़ले जैतन ।)    (आपीप॰92.10)
271    गैदुम (लमगर-छड़गर ~ शरीर) (सौखवा दूध पीके, कुश्ती खेल के साले भर में जुआन हो गेल । लमगर-छड़गर गैदुम शरीर, गेहुआँ रंग । सुन्नर कत्ते लगइ ! पुट्ठा पर माँस । गरदन से लेको कान्हा तक लगइ जैसे साँढ़ के रहे ।)    (आपीप॰76.6)
272    गैरमजरूआ (= गरमजरूआ) (तब कत्ते अच्छा हल । घर के आगे तालाब ! उत्तर गरमजरूआ रास्ता । पूरब भी पच्छिम भी । गैरमजरूआ खुला मैदान । अब सब पर ओकरे कब्जा हे ।)    (आपीप॰23.17)
273    गोइठा (अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ । गँहूम फटकतइ । चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ !)    (आपीप॰89.12)
274    गोजो (= ?) (एक दिन चार गो लफुआ अइलइ - मइया-बेटवा के केप्चर कर लेलकइ, पिस्तौल देखा के, लगभग बारह बजे रात में ! एकाएकी छउँड़ी के बलात्कार करि गेलइ । छउँड़ी बदहोश ! भैवा कहलकइ - चल मैया । बलात्कार के केस नामी होवऽ हइ । बड़ी कड़र । चारो के हम चिन्हऽ हियै । कर दियै केस । मैया कहलकइ नैं बेटा । ओकर कुछ नञ बिगाड़ि होतइ, बिगड़ जइतौ तोरे । गोजो । नान्हि वारि हइ, जाति-कुटुम के पूछतइ ? जो डाकदरनी यहाँ देखा दहीं ।)    (आपीप॰108.14)
275    गोड़ (~ घसकाना; ~ घसकना) (बेटी ! साँच बोलिहें ! तोरा हमरे कीर, कमरिया चिक्कन लागऽ हौ, आव कै भी भेलौ । कहैं गोड़ घसकइल्हीं कि गे !; पेट गिराना जुर्म हइ । जा, कहैं दोसरा डाकदरनी यहाँ । हमरा कोय लफड़ा लग जाय तब ? पुष्पी माय डाकदरनी के गोड़ पकड़ि को कानो लगलखिन, डाकदरनी बीबी ! हमर भाग खराब । बाल-बच्चा जब अनेर हो जा हइ तब कि कैल जा हइ ! गोड़ घसका देलकइ, तब कि करियै ? ... तोरे बेटी ऐसन करि दो तब कि करभो?; किरानी बाबू मुँह में कौर लेलखिन कि ई कहना शुरूह कैलखिन - आँय जी ? कान में करूआ तेल दे को सूत गेल्हो ! निट्ठाह ! जुग जमाना खराब बीतऽ हइ । जुआन बेटी बाहर ! शहर पटना में राखऽ हो ! कैसनो कुछ हो जाय, के जाने ? प्रभू के शान, गोड़ घसक जाय ! तऽ कहाँ के रहभो ?)    (आपीप॰16.17; 19.9; 87.4)
276    गोड़ (= पैर) (हमरा आँखि में पाँखि एक्के गो माया बेटी ! सेकरा करवइ हरजोतवा से ? ... कुछ रहे कि नञ, हमर परतर करतइ हरजोतवा ? साँझ अइतइ भादो में खेत से रोपा करा को, गोड़ में कादो लगल रहतइ ! दिन भर रौदा के झमायल ! गोड़ धोतइ । राति सुततइ मागु जौरे ! गुमसायन महकतइ ! ओकर देह में सट के हमर बेटिया के नीन होतइ ?)    (आपीप॰89.23)
277    गोड़इती (~ करना) (आखिर अनिल बाबू टैक्सी से अइला, आला निकाल के जिछना दने देख के बोलला - केस सिरियस हौ, पइसा खरचा करभीं ? जिछना उनखर गोड़ में लटक गेल । ऐसन जैसे आम से अमरलता, सरकार हमरा से नञ होतई । तोहरे बेटा हको, बचतो तब गोड़इती करतो ।)    (आपीप॰4.11)
278    गोड़-हाँथ (धन्नू चा ओकर कालर पकड़ि को चारि थाप मुँह में लगैलखिन । पूरा आपिस में हल्ला हो गेलइ ! सोचलखिन बड़ा मुसकिल ! मारवो नै कइलों अऽ पकड़ाइयो जाबँ । उठा को हाजी साहब के सरंग गोलो कुरसिया पर फेंकि देलखिन । मथवा फूटि गेलइ ! गोड़ा हाँथा में मोच आ गेलइ !)    (आपीप॰121.6)
279    गोतना (= नीचा करना, झुकाना) (सोहगी अपना के ओकर पंजा से मुक्त हो को भागइ के कोरसिस कैलकइ । बकि मरद के पंजा में कसमसाल जवानी भरल-पूरल छटपटाइत ... औरत के उहे मरद छोड़ सकऽ हे जे नामरद होतइ ! नञ छोड़लकइ ! एतने में बुन्देला चा ओने से जुम गेलखिन ! कहलखिन - इहे पढ़ाइ एजो चलऽ हे हो ! रसलीला । छउँड़ा बक दनी छोड़ देलकइ । छोउँड़ी काठ हो गेलइ । जइसैं के तइसैं ! नै हिलइ नै डोलइ ! मुड़िया गोतने जस के तस !)    (आपीप॰84.17)
280    गोतनी (मान ला, झाँपल-पोतल हमर बियाह हो जाय । उहो तो दिन जोड़तइ, तब ? पति, सास-ससुर, ननद-गोतनी पूरा परिवार हमरा कौन नजर से देखतइ ? ... ओकरा से मौत अच्छा ।; ससुरार के मत पूछो - एक हाकिम रहे तऽ कहल जाय ! घर में सास, ननद, गोतनी, बाहर ससुर, भैंसुर, देवर, पतिदेव के तो बाते जुदा हइ । कौन हाकिम से कइसे निबटइ के चाही ? ई बिना समझने, बिना सीखने अल्हड़ कनियाय तो पहिले साँझ पिटा जाय, या पगला गारत में चल जाय । ई जानना भारतीय नारी के बड़ा कठिन पाठ हइ ।)    (आपीप॰14.23; 100.11)
281    गोतिया (~ भाय) (उ लोग कहइ ले अप्पन हइ, अप्पन, गोतिया एक बाबा के ... मुदा एकर आँख में गोतियारे वाला पानी नञ हे ।; जे कुछ उनकर सोच हलन, एक सीमा तक सही हल । खेत बेच के अच्छा घर में देलका बेटी के बियाह, उ भी सही । मगर घर के चारो तरफ गोतिया के बसा देना भारी भूल हलन । ई तीन गोतिया तीनो तरफ ! साला लोभी !; भोला कहलकइ - से तो हइ, मुदा जुल्मी के मार के जइतों हल, तब कोय हिरोही नै ! ई बेकसूर के, बिना खदी-बदी के अप्पन गोतिया भाय के मार के जेल गेलों, इहे अपसोच हमरा तिल-तिल खा रहल हे । अपना पेट खातिर ई काम कइलों ! सेहो नै भेल, उलटे बाप-दादा के जे दू बीघा हल सेहो बिक गेल ।)    (आपीप॰22.18; 23.14, 15; 64.16)
282    गोतिया-नैया (= गोतिया-नइया) (बेटवा कहलकइ - वंस-खूट, गोतिया-नैया तो हइये हलो, तब केस काहे ले लड़ल्हीं दस बरीस, तनीगो ! रास्ता नञ छोड़लको, अब गोड़ में लटकि को कि होतइ ? बाप-दादा के बनल-बनावल घर बेच देभीं उ लेतइ माटी के मोल, हम जानऽ हियौ !)    (आपीप॰28.14)
283    गोतिया-परोसिया (से दिन से किरानी बाबू माया के वर खोजो लगला । जहाँ-तहाँ इष्ट मित्र, गोतिया-परोसिया से कहना शुरूह कैलका । भला किरानी बाबू के बात ! के चलाय । तरह-तरह के लड़का बतायल गेल । आइ॰ए॰एस॰, पी॰सी॰एस॰, बी॰पी॰एस॰ - ऐसन कत्ते एस॰ लगल लड़का के पास गेला । ओकर माँग सुन के आर अपन औकात तौललका कि अपनै एक्स हो गेला ।)    (आपीप॰87.10-11)
284    गोतियारे (उ लोग कहइ ले अप्पन हइ, अप्पन, गोतिया एक बाबा के ... मुदा एकर आँख में गोतियारे वाला पानी नञ हे ।; रहल बात गाँव वाला के - ओकरा से मदद माँगहो त कहतो - इ तोर आपसी मामला हे, गोतियारे के बात ! हम कि करियो? अपने जैसे होवो, सलट ला ।)    (आपीप॰22.18, 22)
285    गोदी (= गोद) (अग्गे माय ! झखुआ मागु सन जबरदस्त जनिऔरी नञ देखलों हें । लाख कहैत रहलियै ! कनियाय ! एकादसी हमरा नञ धारे हे । एकादसी कइलैं हमर झखुआ के बाप अकाश उड़ गेला । से दिन से हम एकादशी के शुभ काम नञ करऽ ही । दोसर कोय तिथि में जइहा, कोय हर्ज नञ ! अब समझलहीं । कहैत रहलियौ चोरो सगुन बदे हे । तों तो नहिरे जाहा ! खाली देह रहे तऽ कहल जाय, गोदी में सोना सन बुतरू, भरल पूरल ।)    (आपीप॰98.14)
286    गोयठा (देखऽ ही, एक खूँटा में चार दाँत के पहिलूठ बियान वाली कर तर बाछा, पाँच सेर पक्की दूध वाली गाय । पंडित के दान खातिर । ओकरा से कुछ दूर में बढ़िया नसल के एक बाछा बान्हल हइ, साँढ़ दागै ले । ओकरा दागै ले गोयठा के आग में सड़सी धिप रहल हे ।)    (आपीप॰69.5)
287    घटल-बढ़ल (इसटिमिट बन गेल - दू थान ! लड्डू-जिलेबी, पूड़ी-तरकारी, आलू-परवल के रतोवा ! दही-चीनी रेड़म-रेड़ ! बस एकरा से जादा नञ ! सब कगज पर लिखा गेल - नोन से हरदी तक, पत्तल से गिलास भर, राबा से रत्ती, कुछ छूटइ के नै चाही । नै छूटल, ओक्के हो गेल । पंच के मोहर लग गेल । अनुमानतः एक लाख ! दस हजार हाथ में राखो, उपर से घटल-बढ़ल !)    (आपीप॰67.20)
288    घटहिया (= घाट वाला) (चुनाव के समय अइतो तब नेता अइतो ! दूरे से कल जोड़ने ! गोड़ लागी सूपन दा, तोहरे पर आसा दादा !  ... जीत गेल । कहलों - तनी घटहिया सड़का बना देथो हल ? हों हों, अबरी जरूर हो जइतइ । नञ कहियो नञ कहऽ हइ । मुदा बनइतो कहियो नञ ।)    (आपीप॰32.17)
289    घतींगवा (~ भोज) (बेटा, ऐसन रंग चढ़ावो कि जुग-जुग नै मेटावे, ऐसन सुगंध बसावो कि पुश्त-दर-पुश्त दम दमावैत रहे । होवो दा मूँगवा लड्डू, घतींगवा भोज । दा एक दिन समूचा गाँव के चुल्हिया लेवार करि । गाँव भर के गनी-गरीब-अमीर सब के मुँह मीठा करि दा, जे सब मिल के परानी के असीरवाद दिये, स्वर्ग में परानी के सुख मिले ।)    (आपीप॰66.13)
290    घनगर (= घना) (उठ बन्दा, चल परसंडा, से चल देलूँ । जेठ के महीना । चलैत-चलैत दस एगारह बज गेल । टप-टप देह से घाम चूअऽ लगल, पियास से ठोर तिल-तिल सूखे लगल । एक पैड़िया रसता खेते-खेत कहैं आरी-अहरी काँटा-कुस्सा पार कइने-कइने पहुँचलों जहाँ देख के मन प्रसन्न हो गेल । जल भरल तालाब, तालाब पर घनगर पिपर के गाछ ।)    (आपीप॰7.3)
291    घर-दुआर (पेट काट के कौलेज के फीस दा ।  अपने फटल पिन्ही, बाबू साहेब के इजार पिन्हावो, उपर से सेन्ट-साबुन-सरफ, कागज-किताब-कलम ! अऽ पकिट खरचा ! तोरा कहलियौ घर पर रह के पढ़ाइ करो । तऽ कहलें कि नञ चाचा, ओजो टमटरो अगोरवो अऽ एकान्त में पढ़वो करवइ ! देख लेलियो पढ़ाय ! अऽ तों गे छोउँड़ी ? कहाँ दुआर कहाँ घर ! तोर पित्त में कत्ते गरमी हौ जे राते-रात यहाँ तक चल अइलें ?)    (आपीप॰84.23)
292    घरवाली (= पत्नी) (इ हथिन विधायक जी ! सांसद जी ! इ जनता के वोट नञ माँगऽ हथिन, क्रिमनल से वोट लुटवा लऽ हथिन । ... इ घोटाला करऽ हथिन ! जेल जा हथिन, तइयो कुरसी नञ छोड़ऽ हथिन । ... इनकर अलग वेवस्था होवऽ हइ, जहाँ सारी सुविधा हिनकरा हइ । ... वहाँ सारी से मिलऽ हथिन । घरवाली से मिलऽ हथिन ! ... फेर बाहर आवऽ हथिन । सड़क के मिट्टी खा हथिन, गिट्टी खा हथिन । अलकतरा पियऽ हथिन । केस हो जा हइ फूस-फास । बेदाग कोट से बरी हो जा हथिन ।)    (आपीप॰27.6)
293    घाम (चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ ! आँखि खराब हो जइतै । रोपा दिन में मजूर ले सतुआ भूँजतइ । मन के मन घामा में ! ऊ मर जाना बेस जिन्दा रहना नञ !)    (आपीप॰89.14)
294    घीचना (= घींचना, खींचना) (कुस्ती अऽ औरत दुन्नु में भारी बैर । औरत के बल आँखि में, नजर बातर हो हइ ! औरत के नजर से बेटा के बचइ के चाही । नञ तऽ औरत नजर के मन्तर से सब बल घीचि लेतौ । खक्खड़ बना देतौ ।)    (आपीप॰77.20)
295    घीढारी (= घेढ़ारी; घृतढारी) (हम लाख कहलियै छोटकी से, घीढारी नञ कराव । मुदा बूढ़ा-बूढ़ी के बात अब के माने हे ? ले बिरमना अइलौ आगू ? नञ माने हम्मर बात !; घीढारी जे करे सेकरा साल भर नदी नञ नाँघइ के चाही, बरी नञ पारइ के चाही, कोहड़ा लगावइ के या खाय के नञ चाही, सराध के अन्न नञ खाय के चाही !)    (आपीप॰98.1, 4)
296    घुटुस्स (जिछना ठोड़ी पकड़ के बोलल, अब कुल बीमारी भाग जइतौ बौआ ... जहाँ दवाय पिला देलियौ घुटुस्स । जिछना एगो गोली देके पानी देलक, आव माथा पर हाथ फेर के चुप कराइत बोलल - हाँ निगल जो बौआ ... । सब ठीक हो जइतौ !)    (आपीप॰5.12)
297    घुन्नी (एक्को ~ = जरा सा भी) (डाकदर साहब अइला ! नवज छूते मातर भुत हो गेला । "एकरा मछली खिला देलहो ?" - "जी नञ सरकार ! एक्को घुन्नी नञ !" जिछना बोलल । - "तब बोखार कइसे पलट गेलइ ?")    (आपीप॰3.6)
298    घुरना (= घूमना; लौटना; मुड़ना) (अप्पन सब बेटी के अप्पन कमाय से लेके खेत तक बेच के बढ़िया घर में बियाह देलका । समाज भी विचित्र हइ ! बहिन बहिनोय सब सुखी हइ । सारा ! पैसे के जनमल । आदमी के पहचान नञ । हमर सब बहिन सुख में, हम दुख में । उ लोग कभी हमरा घुरि को नञ ताकइ ले आयल ।; बिहान वोट पड़ते हल । राते भोला के सपोट ले दस गो बाहरी गुण्डा एकरा घर में आको डेरा डाल देलक । सबेरे गनौरी चा घरे-घरे घुर के सब के कह देलखिन । भोरे सब लोग भोट देको तब दोसर काम करिहा ।; भोला सुनलक - सिधेसर मिनिस्टर हो गेला ! मारे खुशी के पाँचो नाँच उठल । जेल में मिठाय बाँटलक । बकि जेल से छुटइ के कोय उपाय नै ! एकरा बहुत उमेद हल ! बकि मिनिस्टर साहब ! घुरि को देखइ ले भी नै ऐलखिन ।; मिनिस्टर के औडर भेल, तब मिलइ ले गेल ! चरण छू को परनाम कैलक ! अप्पन बिपत सुनैलक - हम तो निधुरिया हो गेलियो इ केस में । तों ऐसन कठोर कि मदद तो कि करवा, घुर के देखइ ले नै अइला !)    (आपीप॰23.8; 63.8; 64.2, 9)
299    घुरना (= घूमना; लौटना; मुड़ना) (भैंस के नेठो नियर घुरल सींघ के तो बाते छोड़ो ! दू दिन पहिले से किसान तेज छुरी से ओकर मरल चत्ता छिल के चमका दिये । बिहान दुहबिनी ओकरा में सिन्नुर तेल भोगार दिये ! ऐसन भोगारे कि कहल नञ जाय ।; मुदा वीसो वाला टिल्हवा पर जइसैं पहुँचलइ - पच्छिम रूख के पछिया के जबरदस्त झोंका करेजा में लगलइ ! देहे सिल्ल हो गेलइ । ठंढा बरफ, कनकन सोरा । आगू नञ बढ़ सकलय, घुर गेलइ अकेले ।; सोहगी भी चरण पर गिर के कानऽ लगलइ ! काका कहैं बोलिहो नञ ! एक कसूर माफ ! फेर घुर के देखभो तब कहिहा ।)    (आपीप॰74.22; 81.19; 85.6)
300    घुरफेर (घुरफेर ओकर ध्यान थरिया-लोटा पर घर के समान पर गेल । मुदा एकरा से पटना जाय के खरचे पुरे हइ । अचके जिछना के आँख चमक गेल । ओकरा याद आयल, वहाँ अस्पताल में खून खरीदल जा हइ । डूबइत के तिनका ... इहे उमक पर चल देलक पटना ।)    (आपीप॰4.20)
301    घुराना (= लौटाना, वापस करना) (महेश जइते सलाम ठोकलकइ - परनाम इनरदेव बाबू । काल्हु हिनखरा काहे घुरा देलहुन । ला दरखास । काम करि दहो । तों तो सब तरह के भार भुँजइ वाला आदमी हा, तब ? तोर तो सगरे बड़ाय होवे हे, सेहे कुरोधि गेल्हो ।)    (आपीप॰117.2)
302    घूस-घास (हम तो जीत में हलूँ । मुदा हमर बाप के ई अच्छा नञ लगल । ओकरा भंगलाहा के चाहतिये हल खुशी-खुशी ओकरा से बियाह दै के । से नञ करके उलटे झुट्ठा केस में फँसा के हमरा जेल पहुँचा देलक । मानऽ ही हम्मर बाप के नौकरी मिल गेलइ । घूस-घास में पैसा कमा के धनगर हो गेल से से कि ? जाति भी बदल गेलइ ?)    (आपीप॰44.8)
303    घेंची (= गरदन) (मुरदा ठीक सामने आके किनारा लग गेलइ ! मौगी अऽ बेटवा जाके देखलकइ । चिकुलिया बोललइ - देखहो ने जी ! अपसूइये हइ, कत्ते सुन्नर हइ ! सुपन जाके देख के हामी भरलका ! हों हों । चिकुलिया कहलकइ - लगऽ हइ माइयो निकसी हलइ ! खस खेलनी ! नान्हें वैस में एकरा पित्त में कत्ते गरमी हलइ ? कोय अपने परिवार चाँप चढ़ा के मार देलकइ हे ! घेंचिया में रस्सी के दाग हइ !)    (आपीप॰33.9)
304    घोर (बुढ़िया घर से एगो कुश के चटाय लाके चन्दन गाछ के छाहुर में बिछा देलक, आर घर से एक लोटा घोर - जेकरा में जीरा-जमाइन, काला नीमक, मरीच देल । कहलक - पहिले बेटा ! एकरे पी ले । तब पानी पीहें । करेजा ठंढा रहतौ । हम लोटा भर घोर पी गेलूँ, मिजाज शीतल हो गेल । पानी पियइ के हिन्छा खतम ।)    (आपीप॰8.11, 13)
305    घोस्ट (मकुना वाली हाथ नचा के कहलकइ - दुर ने जाय छिछियैली ! आजकल के छौड़ा-छौड़ी घोस्ट कर देलकइ समाज के ... । पेट गिरा के अइलो ह, बोलतो कि ? देखऽ हो नञ, चेहरवा पर चार बज रहलइ हे । से एकर चेहरा लागऽ हल खिलल गुलाब नियर !)    (आपीप॰20.1)
306    चक्कड़-बम (सौखवा सितिया के नगौंटिया साथी हलइ ! सौखवा के भैंस अऽ सितिया के गाय-बकरी सब साथे चरे ! बर के बरहोरी बान्ह के झुलुआ झूले ! कभी चिक्का डोल, कभी चक्कड़ बम, दोल-पत्ता, सतघरवा, तऽ कभी कबड्डी दोनो बच्चा ! औरत मरद के कोय भेद नञ । कभी कुश्ती भी ! सौखवा ओकरा पेंच सिखावइ - कभी धोबिया पाट, तऽ कभी चक्कर घिन्नी, कभी सुसमुनवा, कभी झिट्टी । दुइयो मगन साँझ पड़े घर आवे, भैंस गाय खुट्टा में बान्ह दिये ।)    (आपीप॰74.5)
307    चक्कर घिन्नी (सौखवा सितिया के नगौंटिया साथी हलइ ! सौखवा के भैंस अऽ सितिया के गाय-बकरी सब साथे चरे ! बर के बरहोरी बान्ह के झुलुआ झूले ! कभी चिक्का डोल, कभी चक्कड़ बम, दोल-पत्ता, सतघरवा, तऽ कभी कबड्डी दोनो बच्चा ! औरत मरद के कोय भेद नञ । कभी कुश्ती भी ! सौखवा ओकरा पेंच सिखावइ - कभी धोबिया पाट, तऽ कभी चक्कर घिन्नी, कभी सुसमुनवा, कभी झिट्टी । दुइयो मगन साँझ पड़े घर आवे, भैंस गाय खुट्टा में बान्ह दिये ।)    (आपीप॰74.7)
308    चटाय (= चटाई) (बुढ़िया घर से एगो कुश के चटाय लाके चन्दन गाछ के छाहुर में बिछा देलक, आर घर से एक लोटा घोर - जेकरा में जीरा-जमाइन, काला नीमक, मरीच देल । कहलक - पहिले बेटा ! एकरे पी ले । तब पानी पीहें । करेजा ठंढा रहतौ ।; कुश के चटाय पर ओघड़इलों कि देखऽ ही, एगो बड़ी सुन्नर, जवान लड़की अधनंगा पोशाक पिन्हने घर में आयल !)    (आपीप॰8.10, 14)
309    चत्ता (भैंस के नेठो नियर घुरल सींघ के तो बाते छोड़ो ! दू दिन पहिले से किसान तेज छुरी से ओकर मरल चत्ता छिल के चमका दिये । बिहान दुहबिनी ओकरा में सिन्नुर तेल भोगार दिये ! ऐसन भोगारे कि कहल नञ जाय । गारा में पीतर के सिकड़ी, चमाचम पानी चढ़ायल सोना के मात करे ! गारा में जोठ, जोठ में घंटी, केकरे घंटिये नञ, घण्टा कहो, टनाक-टनाक बाजे ।)    (आपीप॰74.23)
310    चन्नन (= चन्दन) (भीतर दरवाजा के दोनो तरफ नारियल के गाछ, बाहर पीपर के, अँगना नीक को गोबर माटी से नीपल, चिक्कन छह-छह, घर के इसान कोना में खूब सुन्नर कुँइया, ओकरा पर उभैन लगल बालटी, बगल में तुलसी चौरा, महावीर जी के धजा गड़ल, चन्नन के झमटगर गाछ, घन छाहुर ।; फेर तो दिने में, खुले में, चन्नन के छाँह में, तुलसी चौड़ा पर, हमरा शरीर से खेलो लगल, निशा में धुत्त हम भी भूल गेलूँ ।)    (आपीप॰7.19; 9.11)
311    चपोतना (किरानी कुरोधि को ई कहैत कि हम बहुत देखा है पैसा वाला आप जैसे दुग्गी-तिग्गी को ! लीजिये अपना दरखास कहि के फेंकि देलकइ । आर अगल-बगल भी कुले हिनखरे दुरदुरावो लगलन ! महराज बोलने का लूर नहीं है ! आखिर इनका इज्जत है कि नहीं, आप चोर कहियेगा तब कैसे काम होगा । धन्नू चा के मन तो बिगड़लै, मुदा गम भीतर पचा गेलखिन । दरखास जेबी में चपोत के धइने घर आ गेला ।)    (आपीप॰116.22)
312    चब्बोस (= शाबास) (शुरूह में बरतुहार अइलइ - मुदा साफ जबाब दे देलखिन । हमरा सोना सन दू बेटा ! आँखि में पाँखि । बियाह करि को एकरा फाँसी चढ़ा दिये ? खिला-पिला के बिदा करि देथिन । संसार में उनखर परसंसा होवो लगल । हुनकर चलित्तर के सराहना ! बस !! बेटा कहीं मनोज ! नान्हें वैस में मागु मरि गेलइ ! चब्बोस ! कछौटा के पक्का कही कलयुग के भीष्म पितामह ।)    (आपीप॰102.23)
313    चमकाना (मुँह ~) (पपुआ माय चूल्हा में गोइठा पैसावैत कहलकइ - हूँ हूँ, निकरामती मरद के गाल कतै ? अपनै मन बिलैया पुरखायन ! हमरा भिजुन जते सुना ला ! हम जानो हियौ नञ । घर बुधि बारह, बाहर बुधि तीन ! गाँव से बाहर विधाता उहो लेलका छीन । मुँह चमका-चमका, हाथ नचा-नचा तिरछी नजर से मुस्की मारैत कहलकन ।)    (आपीप॰112.9)
314    चमरटोली (पंचू कहलकइ - अच्छे हलइ नुनु । तनी बरहवा दिन अलुआ वाला तरकरिया लागइ काँचे रहि गेलइ हल । अऽ तेरहवा दिन दलिया शायत तनी लगि गेलइ हल, तनी जराइन लागइ । बुधना के मन भीतर-भीतर कड़मड़ा गेलइ । बहुत कुछ कहइ ले चाहऽ हलइ, मुदा नञ कह सकलइ । अप्पन पीर भीतरे-भीतर पी गेलइ । ... चमरटोली गेलइ, अन्हरा मनसुखवा बोललइ - के हा ! बुधन बाबू ?)    (आपीप॰70.23)
315    चरखानी (लड़का अपन चरखानी से हिनकर आँसू पोछैत कहलक - दादा कानो नञ । हम तोहरे नियर लोग ले ही । उ तोरा कि भगइतै । अपने भागो पड़तइ ओकरा !)    (आपीप॰24.15)
316    चलित्तर (= चरित्र) (शुरूह में बरतुहार अइलइ - मुदा साफ जबाब दे देलखिन । हमरा सोना सन दू बेटा ! आँखि में पाँखि । बियाह करि को एकरा फाँसी चढ़ा दिये ? खिला-पिला के बिदा करि देथिन । संसार में उनखर परसंसा होवो लगल । हुनकर चलित्तर के सराहना ! बस !! बेटा कहीं मनोज ! नान्हें वैस में मागु मरि गेलइ ! चब्बोस ! कछौटा के पक्का कही कलयुग के भीष्म पितामह ।)    (आपीप॰102.22)
317    चह-चह (हमर जोड़ी भारती देवी हइ । जवानी में ऊ चह-चह करऽ हलइ । कतनो लोग चहलखिन मुदा ऊ कछौटा के पक्का । तनी एक नै हिललइ ।)    (आपीप॰10.21)
318    चा (= चाचा) (जाड़ा के दिन । साँझ के समय । धन्नू चा चुल्हा तर बैठि को पपुआ माय से कुछ के कुछ कहैत, रहस मारैत, कहलखिन - से कि समझऽ हीं पपुआ माय ? हमरा मामूली आदमी ! हम बाहर खिड़यँजा नञ हियौ से से, नञ तो हम देखा दियौ अप्पन करामत ! हम केकरा से कमि को हिये तोरा लखे जे हो जाय !)    (आपीप॰112.1)
319    चाँप (~ चढ़ा के मार देना) (ई तरे तर कानला-खीजला से अच्छा कुछ कैल जाय । कि कैल जाय ? अगर हम अप्पन माय-बाप के कहऽ ही तब पहिली साँझ चाँप चढ़ा के मार देत । सकरी नदी के तेज धार में भँसा देत । बाद कि होतइ हमरा पता नञ । मरलो पर लोग गारी से थुर्री-थुर्री कर देत । एकरा से अच्छा जेकर हिकइ सेकरे कहल जाय ।; मुरदा ठीक सामने आके किनारा लग गेलइ ! मौगी अऽ बेटवा जाके देखलकइ । चिकुलिया बोललइ - देखहो ने जी ! अपसूइये हइ, कत्ते सुन्नर हइ ! सुपन जाके देख के हामी भरलका ! हों हों । चिकुलिया कहलकइ - लगऽ हइ माइयो निकसी हलइ ! खस खेलनी ! नान्हें वैस में एकरा पित्त में कत्ते गरमी हलइ ? कोय अपने परिवार चाँप चढ़ा के मार देलकइ हे ! घेंचिया में रस्सी के दाग हइ !)    (आपीप॰12.24; 33.8)
320    चाँपाकल (किसान लड़का के खोज होवो लगल ! संजोग से मिल गेल । बीस बीघा हिस्सा, दुआर पर टरेक्टर मैसी - फारगूसन । घर दोबारा पक्का पोस्त ! बाहर भीतर पलिस्तर ! ऐंगना भी पलिस्तर ।  कहैं माटी के दरेस नञ । ऐंगना में चाँपाकल, पैखाना, घर में टी॰भी॰ रेडियो कि नञ जे सब सामान होवऽ हइ । खेत में नहर-टीवेल । सालो भर सब तरह के फसील !)    (आपीप॰89.1)
321    चाँपी (~ भरल दूध) (सबेरे भैंसि दुहि को चाँपी भरल दूध ! जत्ते पीयो, घी बनावो, दही बनावो, छेना बनावो । जइसे खइवी, मनमाना खा ।)    (आपीप॰91.11)
322    चानी (= चाँदी) (पाँच हजार घूस में बात भेलो ! बाबू के कहलियो ! ऊ सूद पर रूपइया लाको देलखिन ! हम दे अइलियै बहाल करइ वाला अपीसर के । ओकरो कइ एक साल हो गेलो ! जब जा हियो, हाँ हाँ ! अब हो जायगा । घुर आवऽ हियो । उहे रूपइया हमरा ले काल हो गेलो । बाबू कहऽ हथुन - ऊ रूपइया तों रंडी के दे अइलें । चानी के जूता केकरा नञ नमा दियै ! एक हाथ रूपइया दोसर हाथ काम । या तो तों नञ देल्हीं, या रूपइया खेतारी कइलें । आखिर एक दिन कुरोधि गेलखुन । कहलखुन - हमर रूपइया ला को दा, या दुओ जीव अलग खा । लटपट बतिया मोहि न सुहाय, टाट पलंग लेहो माथा चढ़ाय ।)    (आपीप॰96.13)
323    चापुट (~ पार पार के खाना) (फुलवा के सबेरे रोटी आव आलू के कुच्चा खिला के सुता देलक हल ! मुदा फुलवा के आँखि में नीन कहाँ ? भूँजल मछली के गंध जो नीन आवो दिये ? ... कनमटकी पारले रह गेल फुलवा । जिछना जब कटोरा में मछली के गुड़िया अऽ मड़गोद भात चापुट पार पार के खाय लगल तऽ फुलवा के कनमटकी वाला मूँदल आँख फट सियाँ खुल गेल ।)    (आपीप॰2.13)
324    चावर (= चाउर; चावल) (अरे भँगलाहा ! किसान घर में बेटिया तोर बचतौ ? पहिली साँझ मर जइतौ ! हम जानऽ हियै नञ ? हमहूँ तो किसाने घर के हियै । कखनै धान उसरतइ, चावर फटकतइ । ओकर रूसी-गरदा उड़तइ ! कपड़ा कार हो जइतइ । गँहूम फटकतइ । चुल्हा में आँच लगइतइ - गोइठा के, लहरेठा के, मकई के बलुरी-डाँट कि कि अल्लर-वल्लर के । धुँइयाँ लगतइ !; शहरी दमाद यहाँ जइभीं ! रात के बाद परात होते ओकर चिन्ता बढ़ जइतै । बाप रे ! कि जन ई कत्ते दिन रहतइ ! ... ऊ शहरी एक सो ग्राम चावर खैतौ । तों देहाती, जइभीं, दुइयो के बदली एसकरे भकोसि जैभीं ! दमदा कहतौ बेटिया से ई डोलइ के नाम नय लऽ हइ ।)    (आपीप॰89.11; 92.2)
325    चाह (= चाय) (कुछ दिन बाद ऊ टेबि को अइलइ, खूब सोचि विचारि को ! अपन जाति के मोहल्ला में जाको सड़क किनारे । चौराहा पर फर्द में टाट के झोपड़ी देको चाह के दोकान देलकइ ! छउँड़ा बाजार में उट्ठा सो-पचास कमा लै । मैया-धीया यहाँ चाह के दोकान पर रहइ ।; ऊ कहलकइ - बेटा के कि ? झारो मुत्ते पातो मुत्ते ! बेटिया तोर बहकल हो तब कोय जा सकऽ हइ । तोरा तोर काम में के मना करतो ! दिन के चाह, रात को बजार खोलि देल्हो तऽ कोय जा सकऽ हइ ।)    (आपीप॰108.3, 5; 109.21)
326    चिक्कन (= चिक्कण, चिकना) (भीतर दरवाजा के दोनो तरफ नारियल के गाछ, बाहर पीपर के, अँगना नीक को गोबर माटी से नीपल, चिक्कन छह-छह, घर के इसान कोना में खूब सुन्नर कुँइया, ओकरा पर उभैन लगल बालटी, बगल में तुलसी चौरा, महावीर जी के धजा गड़ल, चन्नन के झमटगर गाछ, घन छाहुर ।; पुष्पी कभी-कभी एकान्त में अप्पन ओटी से ले को पूरे कमर पर हाथ फिरावे, चारो तरफ, तऽ एक भयावह भविस से आतंकित हो जाय । अपना आप में बुदबुदावे । बाप रे ! कमरिया चिक्कन लागऽ हइ, कहीं धर तो नञ लेलकइ ? छौड़ा पूत्ता ! भाय-बहिन में ऐसन ... नञ सुनलो हल ! से हमरे पर बीत गेल कि ?; अगिला महीना-महीना नञ भेलइ । कमरिया आर जादा चिक्कन लगो लगलइ । पुष्पी के चिन्ता बढ़ गेलइ ।)    (आपीप॰7.18; 12.3, 10)
327    चिक्का-डोल (सौखवा सितिया के नगौंटिया साथी हलइ ! सौखवा के भैंस अऽ सितिया के गाय-बकरी सब साथे चरे ! बर के बरहोरी बान्ह के झुलुआ झूले ! कभी चिक्का डोल, कभी चक्कड़ बम, दोल-पत्ता, सतघरवा, तऽ कभी कबड्डी दोनो बच्चा ! औरत मरद के कोय भेद नञ । कभी कुश्ती भी ! सौखवा ओकरा पेंच सिखावइ - कभी धोबिया पाट, तऽ कभी चक्कर घिन्नी, कभी सुसमुनवा, कभी झिट्टी । दुइयो मगन साँझ पड़े घर आवे, भैंस गाय खुट्टा में बान्ह दिये ।)    (आपीप॰74.4)
328    चिघार (~ पारना; बरी ~) (तहिने से जिछना ले सब बुतरू फुलवा बन गेल । उ पागल नियर जेकरा पकड़ऽ हइ सेकरा दबोचिये ले हइ । छाती से लगा ले हइ, चूम ले हइ । आव बुतरू-वानर ओकरा देख के चिघार पार के भाग जा हइ । भाग रेऽऽऽ, जिछनाऽऽऽ ... !; घीढारी जे करे सेकरा साल भर नदी नञ नाँघइ के चाही, बरी नञ पारइ के चाही, कोहड़ा लगावइ के या खाय के नञ चाही, सराध के अन्न नञ खाय के चाही !)    (आपीप॰5.17; 98.5)
329    चिजौर (= चिजोर) (जइसैं पाकड़ तर छाहुर में सथरा पर पहुँचलियै कि दुलो चा टेरो लगलथिन - तोरे कारनमा गे सुँरगा इटवा ढोवलियै, कि धइलों जोगिया के भेस जी । ... कहना शुरूह कैलखिन - कवि ? तोर बालाजीत । जानऽ हो कुछ ? वह-वह चिजौरवा के फेरा में बालू ढोवइ ले डेली पकड़ लेलको ।)    (आपीप॰94.4)
330    चित्ती (~ कौड़ी) (जिछना बोलल - हे जरी कड़ा-कड़ा दवाय दहो । अनिल बाबू चिट्ठा लिख के चल गेलखिन समदैत, दवाय पटना में मिलतौ । अब रुपइया कहाँ से आवे । दवाय तो कड़ा-कड़ा लिखा गेल, हाथ में चित्ती कौड़ी नञ ।)    (आपीप॰4.16)
331    चिन्हना (= पहचानना) (मइया एक छन तो सुन के सन्न रह गेलइ ! मोहना ... भीतर घुइया ... ! हम ऐसन जानतिये हल तब जाय नै देतियौ हल ! हम तो अच्छा आदमी समझऽ हलियै । सेकर ई काम ! भाइयो-बहिन नञ चिन्हे ! ई जुग में केकरा पर विसवास ! ठीक हइ, कल्ह चलें डाकदरनी यहाँ खलास करा दियौ !; पहुँचिये तो गेलइ ! लाल-लाल भुट बैगना के खेत में ! देखे हइ तऽ कि ? मचान पर सीरक ओढ़ने चित होके बजावइ में मसगुल हइ । भिरिया जइते माँतर चिन्ह गेलइ । मर्रर्र ! दुर्र हो ! इ तो मोहना हिकइ ! बँसुरी कहाँ हइ ! किदो माटी के बनल हइ !; बप्पा अपन बलात्कारी बेटा के बोलैलक । अइलइ। पूछलकइ - तोरा पर ई सब आरोप हौ । कि सच हइ ? - नञ ! हम एकरा चिन्हबो नञ करऽ हियै ! कहौंका हिकइ । भले चाह दू चारि बेरी एकर दोकान पर पीलियै हे । दोकान पर तो संसार जा हइ ।)    (आपीप॰17.16; 82.17; 110.2)
332    चिपास (पचमा कहलकइ - अहो ! परानी परानी के अंसा होवऽ हइ । एकर मैया आदमी हलइ ? भगवान हो ! मँहा करमकीट ... । कौड़ी चूस्स ... भारी चिपास ... अपने कहियो भर पेट खैइले होतइ, जे भोज नीक होते हल ?)    (आपीप॰71.20)
333    चिभलाना (= चभिलाना, चिम्हलाना, चम्हलाना; स्वाद लेने के लिए खाने की वस्तु मुँह में इधर-उधर करना, घुमाना) (शहरी दमाद यहाँ जइभीं ! रात के बाद परात होते ओकर चिन्ता बढ़ जइतै । बाप रे ! कि जन ई कत्ते दिन रहतइ ! ... तोर बेटी के मन करतौ बूँट के भूँजा खाय के । बाजार से खरीद के लइतौ एक सौ गिराम ! चालीस रूपइया कि॰ । छिपिया पर रख के चार-चार दाना मुँह में चिभला-चिभला खइतौ ! नितरा-नितरा ! बूँट के भूँजा । ऊ खाना नञ भेल, खाली जी फेरन । भगवान ने करे ऐसन होय !)    (आपीप॰92.6)
334    चिरमिच्ची (~ छाप) (ललका ~; भखरा ~; सोनमा ~) (गाय के तो सिंगार मत कहो, देखैत बनतो हल । सींग में औरत आको, जेकरा दुबिनी कहऽ हइ, घी सिन्नुर लगा दिये । कोय ललका, कोय किसान भखरा सिन्नुर लगवावे । कोय सोनमा सिन्नुर से सींग चमचमावय ले लगावावै । जोठ फुदना चिलिम छाप , चिरमिच्ची छाप । तरह-तरह के छाप मत पूछो । मरद गाय के सींग में सिन्नुर नञ लगावऽ हलइ ! काहे तऽ गाय माता हिखिन !)    (आपीप॰74.20)
335    चिराँय (= चिड़िया) (बुन्देला चा कहलखिन - कि ई अवजवा ? हम तो देखलियै हे । जंगल देश के बड़ी सुन्नर नर-मेघी दू चिराँय हइ । अऽ जोट्टे बोलऽ हइ । वह बँसविटिया में ।; बुन्देला चा से लोग पूछलकन - चाचा, अब भोर-भोर ऊ चिरैयाँ नञ बोलऽ हइ ? काका कहलखिन - अब कहाँ देखइ हियै ! अरे ! पंछी के कौन ठेकाना । जहाँ जब तक खाना-दाना मिललइ, हइ । नञ मिललइ, कहैं चल गेलइ ।)    (आपीप॰82.4; 85.7)
336    चिलकौरी (= चिलकोरी, लरकोरी, जिसकी गोद में दूध पीता बच्चा हो) (हम अपन औरत से बतिया रहलूँ हल कि - तों हीं जाऽ । जिद्द मार देलक । नेवता के बात हइ, हम चिलकौरी, बिसतौरियो नञ पूरल ह । एतना गो फोहवा के कहाँ ले जावँ ? नेवता मारना अच्छा नञ हो । तभी दूध देवइ वाला आल । कहलक - दुर महराय ! गुलामगढ़ से आजादनगर जाय में कुछ हइ ? तीरे-कोने मुसकिल से तीन कोस ।)    (आपीप॰6.9)
337    चिल्ह (= चील) (चौठा कहलकइ - अरे, झिंगना के बेटवा दही परसै ? ... खड़े-खड़े लागइ जइसे पतला पर चिल्ह छेर देलक हे । टिक्का करइ भर ! फेर लैलकइ लड्डू ! कहइ आर भागल जाय ! लड्डू-लड्डू-लड्डू .... ।)    (आपीप॰71.16)
338    चुकती (= सब कोई) (चाचा ! कौन जनम के दुश्मन हलियो ! अच्छा बैर सधैल्हो ! खर्च भी, कज भंड भी ! आठ आना ले एक टोपी बिना विधान नञ पूरा भेलइ । आर अन्हरा मनसुखवा भूखले रहि गेलइ ! दुइयो दिन ! कहलियो तऽ कहल्हो चुकती खा लेलकइ ।)    (आपीप॰72.14)
339    चुकन्नर (= चुकन्दर) (किसान दुलहा सबेरे जाड़ा में खेत जैतन, ओने से अइतन दौरी भरल तरकारी लेले । ओकरा में होतन लाल टमाटर, हरियरकी मिरचाय, धनिया के पत्ता, बूँट के साग, बथुआ के साग, सरसो के पत्ता, पालक, कोबी, मुराय, बैगन, मेथी के पत्ता, चुकन्नर । लाको घर में धर देतन ढल्ल बरौनी ! जत्ते जी में आवो, बनावो खा ! स्वास्थ सुन्नर रहतो !)    (आपीप॰91.9)
340    चुक्क-मुक्कु (= चुक्को-मुक्को) ("एकरा मछली खिला देलहो ?" - "जी नञ सरकार ! एक्को घुन्नी नञ !" जिछना बोलल । - "तब बोखार कइसे पलट गेलइ ?" ... जिछना माथा पर हाथ धर के, जमीन पर चुक्क-मुक्कु बैठ के बोलल - "हम्मर भाग अभाग सरकार ।" आला लगावइत डाकदर साहेब बोलला - "तों झूठ बोले हें । इ जरूर मछली खइलक हे ।")    (आपीप॰3.7)
341    चुन्नी-चुन्नी (= चूर्ण-चूर्ण; चूर-चूर) (मोहना के आँख में आँसू आ गेलइ । टप-टप चूअऽ लगलइ । चाचा के गोड़ पर गिर पड़लइ ! माँफ करहो काका ! अब बँसिया नञ बजइवइ । अऽ माटी उरेहि को बनायल बँसिया मचान के खंभा पर बजाड़ देलकइ । ऊ चुन्नी-चुन्नी हो गेलइ ।)    (आपीप॰85.3)
342    चुल्हिया लेवार (~ भोज) (बेटा, ऐसन रंग चढ़ावो कि जुग-जुग नै मेटावे, ऐसन सुगंध बसावो कि पुश्त-दर-पुश्त दम दमावैत रहे । होवो दा मूँगवा लड्डू, घतींगवा भोज । दा एक दिन समूचा गाँव के चुल्हिया लेवार करि । गाँव भर के गनी-गरीब-अमीर सब के मुँह मीठा करि दा, जे सब मिल के परानी के असीरवाद दिये, स्वर्ग में परानी के सुख मिले ।)    (आपीप॰66.14)
343    चूड़ा (~ के गवाही दही !; दही-~) (दुलो चा गरजि को बोलो लगलखिन - यह ! यह ! चूड़ा के गवाही दही ! हरिण के जामनी सूअर ! कवि के दोस्त हिकन जिगरी ! मिलावो लगला । खूब नोन-तेल लगावो लगला ! अभियों कि नञ हइ ओकरा ! चार बीघा जमीन हिस्सा ! अपने भी बी॰ए॰ पास, मागू भी पढ़ल ! गाँव भर के नुग्गा सीये ! दरजीनी बीबी ! अब कि चाही ?; धन्नू चा सबेरे घर से दही-चूड़ा खा को, जतरा बनैने सबसे पहिले आपिस में दम दाखिल । जइते इनरदेव बाबू के सलाम ठोकलखिन ! पूछलखिन - हमर दरखास अइलइ इनरदेव बाबू ?)    (आपीप॰94.21; 115.24)
344    चूल्हा-चक्की (बेटिया कहलकइ मैया से - अब कि करभीं मइया ? कुछ तो सोचहीं । मैया कहलकइ - कि करियै ? जे तोंहीं कहीं । - जो ने, मनोज के कह के कुछ माँग लावें । खाय पीयइ ले । चूल्हा-चक्की जोरें । ऐइसे को दिन काम चलतइ ?)    (आपीप॰110.24)
345    चेहरा (~ पर चार बजना) (मकुना वाली हाथ नचा के कहलकइ - दुर ने जाय छिछियैली ! आजकल के छौड़ा-छौड़ी घोस्ट कर देलकइ समाज के ... । पेट गिरा के अइलो ह, बोलतो कि ? देखऽ हो नञ, चेहरवा पर चार बज रहलइ हे । से एकर चेहरा लागऽ हल खिलल गुलाब नियर !)    (आपीप॰20.2)
346    चोर-चुहार (खइलूँ अऽ भारी मन से दुखी चलइ घड़ी कहलूँ अपन मागु के - अहे ! कहावत हइ कि साल भर के रसता चली, मुदा महिना वाला नञ । हमरा ई सौटकट में खतरा मालूम दे हौ । उ डाँट देलक । हों, तोहरा दिने में बाघ झपटऽ हइ ? तोरा जिमा में कि हइये हो जे चोर-चुहार लेतइ ?)    (आपीप॰6.20)
347    चोरी-छिनरपन (तब तक हम सहकले सले-सले कहलियै - से सब बात कि रहतइ । अब ऊ बाबत रहलइ ? फागू दास वाला ? अब तो बाप खैलका घी तऽ बेटा हाथ सूँघे । कोय काम करतइ नै तब कइसे को परिवार चलतइ ? चोरी-छिनरपन तो नञ कैलकइ ? अप्पन देहन से कुछ कमा लेलकइ तब कि हर्ज ?)    (आपीप॰94.19)
348    चौअन्नी (~ मुसकान) (हौदा साहब चौअन्नी मुसकान छोड़ैत कहलखिन - असमिरती, अभी ओते पैसा तो नञ होतइ । जे हइ से तों ले ले, फेर बाद में देखल जइतइ ।)    (आपीप॰50.24)
349    चौठ (करऽ पड़ियानि ~ !) (टमाटर साव दोनों के खूब समझइलकइ - मुदा ! छौड़ी मुसकुरा के कहलकइ बाबू ! तोरा डर लगो तऽ चल जा, हम अभी नञ जइवो ! छँउड़ो ओतने बात ! टमाटर दुइयो जीव चित्त ! अब कि करवा, करो पैड़ियानि चौठ ... !; केस हो गेलन । पपुआ माय जानलकइ । चाचा पर बरसि गेलन - यह ! मुरूखवा के काम ! करो पड़ियानि चौठ ! ई हुड्डा ! रूपइवो बुड़ा देलकइ अऽ उपर से केस भी माथा पर ले हइलइ ! एतना कहि को माथा ठोकि लेलकइ ! बिना बिना कानो लगलइ ! हाय रे !!)    (आपीप॰28.4; 121.11)
350    चौड़ा (= चौरा) (हमरा से कहलकइ - ठहरो, भागिहा नञ । कहि को अन्दर गेलइ । ओने से तश्तरी में बिस्कुट आव कप में चाह लेने हाजिर । नीचे तुलसी चौड़ा पर रखि को अपनौ बैठि गेलइ, कहलकइ - पियो ।; देखते मातर हम चाय पीना भूल गेलों, टुक-टुक ओकरे देखैत रहलों, उहो । एक छन हमरा गौर से देखलक । फेर घर से दू तस्तरी में भूँजल काजू अऽ दू गो बोतल निकाल के लाके तुलसी चौड़ा पर रख देलक ।; फेर तो दिने में, खुले में, चन्नन के छाँह में, तुलसी चौड़ा पर, हमरा शरीर से खेलो लगल, निशा में धुत्त हम भी भूल गेलूँ ।)    (आपीप॰8.21; 9.7, 11)
351    चौतर (~ मारना) (हूर ले पाहुर आ गेल ! ओकर चारो गोड़ मजबूत रस्सी से कसि को बान्हि देलकइ । ओकरा में एक से दू गो नौजवान पैना पेस के उठा लै, आर हूर ... ले हूर ... कह के भैंसिया के सिंघिया भिजुन दै। कोय-कोय भैंस तो पाहुर के किकियाहट सुन के लेह कबड्डी भागइ । कोय भैंस एकाह चौतर मारइ, पाहुर कें कें करइ !)    (आपीप॰75.12)
352    चौतार (~ मारना) (जे किसान के भैंस बलगर अऽ गेरगर हलइ से लछरि-लछरि चौतार मारइ । ई साल के हूर वाला पाहुर के लेधड़ी, सौखवे के भैंस छिरियैलकइ ।)    (आपीप॰75.16)
353    चौर (पीयर-पीयर चमकदार जैसे सोना के पाँखि होय । मथवा पर ललका गुलाब के फूल नियर, पुछिया झवरल उज्जर चौर नियर । देखइ के चाही, देखइ जुकुर हे, बकि के जा हइ एते ठंढा में बँसविट्टी ...।)    (आपीप॰82.8)
354    चौरा (तुलसी ~) (भीतर दरवाजा के दोनो तरफ नारियल के गाछ, बाहर पीपर के, अँगना नीक को गोबर माटी से नीपल, चिक्कन छह-छह, घर के इसान कोना में खूब सुन्नर कुँइया, ओकरा पर उभैन लगल बालटी, बगल में तुलसी चौरा, महावीर जी के धजा गड़ल, चन्नन के झमटगर गाछ, घन छाहुर ।)    (आपीप॰7.19)
355    छउँड़ा (मनोज बाबू पूछलखिन - बड़ छउँड़ी हइ कि छउँड़ा ? - छउँड़ी पहिलूठ हो कि । लगले दू बरीस बाद छउँड़ा भेलो । छउँड़ी के यह पनरहवाँ बीत के सोलहवाँ चढ़लो हे ।)    (आपीप॰105.5, 6)
356    छउँड़ी (मनोज बाबू पूछलखिन - बड़ छउँड़ी हइ कि छउँड़ा ? - छउँड़ी पहिलूठ हो कि । लगले दू बरीस बाद छउँड़ा भेलो । छउँड़ी के यह पनरहवाँ बीत के सोलहवाँ चढ़लो हे ।)    (आपीप॰105.5, 6)
357    छउड़ा पुत्ता, छउँड़ा पुत्ता (जो तोरा से कुच्छो नञ होतौ । हम जो मरद रहतियौ हल तब देखा देतियौ हल ! हमरा सहियारल नञ जा हउ । देह में उद्वेग लगल हौ । हमरे चीज अऽ हम कहँय नञ । जो रे छउड़ा पुत्ता ! तोरा भोग नञ होइहौ !; बिहान महेश पपुआ माय भिजुन आयल । सारी नो सो से समझा देलकइ । पपुआ माय भीतर से कड़मड़ा गेलइ । कि कहऽ हो महेश ? तीन हजार ... मर दुर्र ... हो ... ई तो दीना दीनी डकैती भेलइ ! बम पिस्तौल से नञ लूटऽ हइ, कलम के मारि मरऽ हइ । गे मइयो रे ! छउँड़ा पुत्ता ... नञ लेब रूपइया ! करजे ने होत, जाय भँगलाहा ।)    (आपीप॰38.2; 118.11)
358    छक (~ देके करेजा में लगना) (जा, हम ओतै बहस नञ जानी ! देखऽ हो महेश रात-दिन करि को सरकारी रूपइया निकाललका  संसार अबूध हइ ? तों एगो बुधगर ... । ई बात धन्नू चा के लग गेलन छक दोको करेजा में । ठीक हइ, घूस में पैसा लागतौ ! पाछू हमरा नञ कहिहें । पैसवा खरच होवऽ हइ तब तोरा देह में नोचनी लागो लगऽ हौ ।)    (आपीप॰113.22)
359    छक्का-पंजा (= चालबाजी, धूर्त्तता) (जनता के गाढ़ी कमाय के रुपैया एकरा दरमाहा में जा रहलइ हे । अऽ दरमाहा तनी मनी नञ, दस हजार, बीस हजार । तइयो इ घूस ले बेकल हइ । फैसला करतो तो दस साल में, बीस साल में । जब गवाह मर जइतो तऽ गवाही ले नोटिस करतो, जब मुद्दइ बुढ़ा हो जइतो तब कटरा पर चढ़ा को गरीब अनपढ़ बीस बरीस पहिले के बात पूछतइ ! कहौं के बात कहाँ से ? बेचारा गाँव के गरीब अनपढ़ ओते छक्का पंजा जाने नहियें । कुछ से कुछ बोला गेलइ । बाद ओकरे बात पर वकील साहब बहस करतो । बहस कि ? बुझो बात के बुकनी । उहे सुनि को हाकिम फैसला देता । उ फैसला कतना सही होता ?)    (आपीप॰25.20)
360    छगुनना (सितिया लोटवा लैत मुस्का के कहलकइ - जो रे भोम्हा ! तोरा कुछ नञ बुझो अइलौ ! अऽ भीतर चल गेलइ । दूधा उझलि को लोटवा मैया पहमा भेजवा देलकइ । सौखवा दू छन खड़ा सोचैत रहलइ - हमरा कि नञ बुझो अइलइ ? फेर इहे सोचैत घर चल अइलै । बिहान दस बजे सितिया के रोकसदी हो गेलइ । सौखवा सवारी के पाछू-पाछू मन में इहे छगुनैत - 'हमरा कि नञ बुझो अइलइ ? सितिया से पूछ के रहबै ।' टीशन तक गेलइ ।; कनियाय जब सवारी चढ़ली - मने मन छगुनैत गेली । कने से कनकट्टी बुढ़िया, झाँझी कुतिया माइयो ! बचलइ हल जतरा भगन करइ ले । हमरा पर तो जर-जिद से पड़ल हइ माइयो !)    (आपीप॰79.24; 99.9)
361    छनकना (माया हर बार गर्मी छुट्टी में गाँव आवऽ हल, मुदा ई बार जे घर आल ह सेकरा में कुछ विशेष बात हइ । हर बार अकेले आवऽ हल, ई बार लड़का साथी साथ अइलै हे यहाँ तक पहुँचावइ ले । मैया ! देखते माँतर छनक गेलइ ! ओकरा मन में डौट गेलइ ! कहौं अँचरा में तो दाग नञ लगैलकइ रे बाप ! एकन्त में बेटिया से पूछलकइ - ई के हिकइ गे ?)    (आपीप॰86.4)
362    छपरी (आगू ओकरा नञ बढ़ल गेलइ । घर लौट रहल हल । एक छपरी तर कुछ लोग इहे भोज के चरचा कर रहलखिन हल । बुधना छुप के सुनो लगलइ ।)    (आपीप॰71.8)
363    छरहर (मइया पूछलकइ - कैसन मन हौ गे ? अच्छे हइ मइया । जो सबेरे नहा-सोना ले, मन फरेस हो जइतौ । कै भेलो हे, खिचड़ी बना को खा ले । छरहर बनइहें, खूब सिझा के, मूँग दाल वाला । फरहर बनइभीं तब ने पचतौ ।)    (आपीप॰16.9)
364    छह-छह (भीतर दरवाजा के दोनो तरफ नारियल के गाछ, बाहर पीपर के, अँगना नीक को गोबर माटी से नीपल, चिक्कन छह-छह, घर के इसान कोना में खूब सुन्नर कुँइया, ओकरा पर उभैन लगल बालटी, बगल में तुलसी चौरा, महावीर जी के धजा गड़ल, चन्नन के झमटगर गाछ, घन छाहुर ।)    (आपीप॰7.18)
365    छहाछत (= साक्षात्) (हमर पाँव के आहट पाको एक बुढ़िया घर से निकलल, पाँचो हाथ नम्बा तगड़ा गोर बुराक, माथा के बाल उज्जर बर्फ, फह-फह बगुला के पाँखि सन साड़ी पिन्हने, जइसे छहाछत भारत माता, शीश मुकुट हिमवान देश का, या खुद सरसती माता ।; जे जौन काम में निपुन हलखिन, से से काम पकड़ लेलखिन । सब सामान पर आदमी सजाल ! बरहा के पीपर तर जैसे कुबेर अपन भंडार उझल देलखिन ! लछमी आपन सारा साज-सामान के साथ जैसे विराजमान हो गेलखिन ! छहाछत लछमी । रिद्धि-सिद्धि आपन छटा छितरा देलखिन । देखैत बनइ ।)    (आपीप॰8.4; 68.1)
366    छाँड़न (तभी चिकुलिया बोललइ - असल में अब एन्ने छाँड़न हो गेलइ । मरल मरल धार चलऽ हइ । मुरदवा अइतइ कि ? बुढ़ी कहऽ हथिन - कभी ई घाट के चलती हलइ । रात दिन मुरदा जरैत रहऽ हलइ ।)    (आपीप॰32.3)
367    छाहुर (= छाया) (बुढ़िया घर से एगो कुश के चटाय लाके चन्दन गाछ के छाहुर में बिछा देलक, आर घर से एक लोटा घोर - जेकरा में जीरा-जमाइन, काला नीमक, मरीच देल । कहलक - पहिले बेटा ! एकरे पी ले । तब पानी पीहें । करेजा ठंढा रहतौ ।; तीनों गंगा के किछार में पीपर छाहुर तर बैठ गेला ।; सोहना ओजइ छाहुर तर बैठल सब देख रहलइ हल । ऊ ई तमाशा देख के भीतर से कचटि को रह गेलइ ।)    (आपीप॰8.10; 33.12; 78.5)
368    छिछियैली (मकुना वाली हाथ नचा के कहलकइ - दुर ने जाय छिछियैली ! आजकल के छौड़ा-छौड़ी घोस्ट कर देलकइ समाज के ... । पेट गिरा के अइलो ह, बोलतो कि ? देखऽ हो नञ, चेहरवा पर चार बज रहलइ हे । से एकर चेहरा लागऽ हल खिलल गुलाब नियर !; छउँड़ी सलवार फराक पिन्हऽ लगलइ । मइया कहलकइ - दुर ने जाय ! छिछियैली ! ई लदर-फदर ... एकरा पिन्ह के रोपइ में बनतौ ? पेन्ह ले घंघरिया आव उपर से अधबहिमा कमीचवा । सेकर उपर ओढ़निया ले ले । छउँड़ी सेहे कइलकइ ।)    (आपीप॰19.25; 105.12)
369    छिप्पी (= छिपुली; छोटी थाली, तश्तरी)  (जो बेटा ! रामदास, तोहीं ले आव । - नञ लइहें रे ! बइठल-बइठल हिकैती करैत रहतौ ! चिकुलिया कहलकइ । सूपन अपने उठला । पाँच मिलिट में एक बोतल आर साथ में चखना लेको आ गेला ! खुसी-खुसी तेज गति से घर पहुँचला । हुकुम कैलका - एगो छिप्पी-गिलास, एक लोटा पानी पहुँचावो !; शहरी दमाद यहाँ जइभीं ! रात के बाद परात होते ओकर चिन्ता बढ़ जइतै । बाप रे ! कि जन ई कत्ते दिन रहतइ ! ... तोर बेटी के मन करतौ बूँट के भूँजा खाय के । बाजार से खरीद के लइतौ एक सौ गिराम ! चालीस रूपइया कि॰ । छिपिया पर रख के चार-चार दाना मुँह में चिभला-चिभला खइतौ ! नितरा-नितरा ! बूँट के भूँजा । ऊ खाना नञ भेल, खाली जी फेरन । भगवान ने करे ऐसन होय !)    (आपीप॰34.24; 92.6)
370    छिरियाना (= छितराना) (जे किसान के भैंस बलगर अऽ गेरगर हलइ से लछरि-लछरि चौतार मारइ । ई साल के हूर वाला पाहुर के लेधड़ी, सौखवे के भैंस छिरियैलकइ ।)    (आपीप॰75.17)
371    छुछुनर (= छुछुन्नर; छुछुन्दर) (वहाँ हाथ लगा देलखिन जहाँ नञ लगावइ के चाही ... ऊ कानो लगलइ ! खोपड़ा से बाहर आ गेलइ । कानले घर गेलइ ! ... ऊ मैया के जाको सब कहलकइ ! मैया लोर पोछैत करेजा से सटा लेलकइ - दुर ने जाय छुछुनर ! एतना गो तो ओकरा खुद के जनमल बेटी रहते हल । अब तों खेत नञ अगोरइ ने जइहें । हम हीं जइबइ । ई बात आर कहैं नञ बोलिहें, कुमारि-वारि हें ।)    (आपीप॰107.18)
372    छूटल-बढ़ल (इ तरह से पाँच-पाँच बेरी जोगनी-झकिनी-शाकिनी, भूत-भूतनी, पिचासनी के नाम लेको धूप देको - अंत में सब धूप आग में डाल के कहलका - माय जगहिया, माय गंगा, छूटल-बढ़ल सान्ही-कोन्हा में अँटकल-सटकल देवी-देवता जे हा आशा लगइने । सब के नाम से मुरधान दऽ हियो । हम्मर रोजगार में सहाय होइहा ।)    (आपीप॰31.24)
373    छूना-छापना (ऊ कहलखिन - दुर हो कौवा ! जे लड़की हँसि गेलइ, समझी ऊ फँसि गेलइ । ओकरा तनी लार-दुलार दहीं, कुछ नोट छोड़हीं । छू-छाप करहीं । बात बनल हइ । माल तो बेजोड़ हौ, ई एखने गदहो के पसीन कर लेतइ । उमरिये ऐसन होवऽ हइ ।)    (आपीप॰106.14)
374    छेदमहिया (पपुआ माय गुम हो गेलइ । मन मसोसि को तीन हजार रूपइया चावर वाला कोठी से निकालि को दैत कहलकइ - एकरा से एक छेदमहिया बेसी नञ जादा । माँगतो, रूपइया घुरइने चल अइहा । बात जानी साफ ।)    (आपीप॰118.18)
375    छेरकट (~ उड़ाना) (आँय ! माय काली ! एत्ते तो खोंटा-पिपरी नियर धरती पर आदमी जनमि गेलइ ! एकरा काट-वाछ नञ करभो तब जुलुम हो जइतइ, माता । जुलुम तो हो रहलइ हे । जल्दी-जल्दी मारने जाहो आर हम्मर घाट में भेजने जाहो । से तों करवे नञ करऽ हो ! उल्टे मरऽ हइ एक, तऽ जनमऽ हइ हजार । छेरकट उड़ा दऽ हइ । अनगिनती ! अब जरूरत हलइ, जनमते हल एक, आर मरते हल अनगिनती । तब संसार बलेन्स में रहतो हल ।)    (आपीप॰31.16)
376    छेरना (= पतला पाखाना करना) (चौठा कहलकइ - अरे, झिंगना के बेटवा दही परसै ? ... खड़े-खड़े लागइ जइसे पतला पर चिल्ह छेर देलक हे । टिक्का करइ भर ! फेर लैलकइ लड्डू ! कहइ आर भागल जाय ! लड्डू-लड्डू-लड्डू .... ।)    (आपीप॰71.16)
377    छोटका (कि जने कि होत ? आखिर होय बिहान, होय बिहान, चिट्ठी लिखलकी - मैया जी, सादर परनाम । बाबू के ! भैया के ! दीदी के ! गोड़ लागी । सब बड़कन, जेठकन, छोटकन के पाँय लागी । हाल यहाँ के भगवान भरोसे !)    (आपीप॰101.4)
378    छोटकी (हम लाख कहलियै छोटकी से, घीढारी नञ कराव । मुदा बूढ़ा-बूढ़ी के बात अब के माने हे ? ले बिरमना अइलौ आगू ? नञ माने हम्मर बात !; चिट्ठी लिखलकी - मैया जी, सादर परनाम । बाबू के ! भैया के ! दीदी के ! गोड़ लागी । सब बड़कन, जेठकन, छोटकन के पाँय लागी । हाल यहाँ के भगवान भरोसे ! वहाँ के नीक करथ भगवान । ई चिट्ठी नञ तार समझब । पपुआ बाबू के जल्दी भेज देथिन । खाना वहाँ हाथ सुखाना यहाँ । थोड़ा लिखना बहुत समझना । तोहर: छोटकी !; झखुआ छोटकी के नहिरा से ले, आल ! बुढ़िया आपन पोता के हालत देख वुक्का फाड़ कानो लगल । )    (आपीप॰98.1; 101.9, 10)
379    छोटहा (जे बड़ाय करें तो ऐसन । यहाँ तोर बाप, हमरा बाप के गोड़ पर जनौआ धर के कहलखुन । अब जनौआ के लाज तोहरे जिमा । तब जाको कहैं हमरे तोरे जूड़ा बन्हन भेल । लछमी अइली हमरा घर । तोरा अर छोटहा खनदान मानऽ हलखिन हमर बाप !)    (आपीप॰113.19)
380    छौड़ा पूत (= छौड़ा पूता) (ठीक हइ, घूस में पैसा लागतौ ! पाछू हमरा नञ कहिहें । पैसवा खरच होवऽ हइ तब तोरा देह में नोचनी लागो लगऽ हौ । - कहवै कि ? कत्ते लगतइ ? हजार-दू हजार । तब निकलवो तो करतइ - बीस हजार । रहे दू हजार कम्मे छौड़ा पूत के ।)    (आपीप॰114.2)
381    छौड़ा-छौड़ी (मकुना वाली हाथ नचा के कहलकइ - दुर ने जाय छिछियैली ! आजकल के छौड़ा-छौड़ी घोस्ट कर देलकइ समाज के ... । पेट गिरा के अइलो ह, बोलतो कि ? देखऽ हो नञ, चेहरवा पर चार बज रहलइ हे । से एकर चेहरा लागऽ हल खिलल गुलाब नियर !)    (आपीप॰20.1)


 

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